सुब्रामन्यिम चन्द्रशेखर


20वीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिकों में से एक वैज्ञानिक सुब्रामन्यिम चन्द्रशेखर अपने जीवन काल में ही एक किंदवंति बन गए। कामेश्वर सी. वाली चन्द्रशेखर के जीवन के बारे में लिखता है कि “ विज्ञान की खोज में असाधारण समर्पण और विज्ञान के नियमों को अमली रूप देने और जीवन में निकटतम संभावित सीमा तक उसके मानों को आत्मसात करने में वह सब से अलग दिखाई देते हैं”। उसके बहुसर्जक योगदानों का विस्तार खगोल – भौतिक, भौतिक – विज्ञान और व्याहारिक गणित तक था। उसका जीवन उन्नति का सर्वोत्तम उदाहरण है जिसे कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है बशर्ते कि उसमें संकल्प – शक्ति, योग्यता और धैर्य हो। उसकी यात्रा आसान नहीं थी। उसे सब प्रकार की कठिनाईयों से झूझना पड़ा। वह एक ऐसी रचना थी जिसे भारत (जहां उसका जन्म हुआ), इंग्लैंड और यूएसए की तीन अत्यधिक भिन्न संस्कृतियों की जटिलताओं द्वारा आकार दिया गया।

वह मानवों की साझी परम्परा में विश्वास रखता था। उसने कहा था, “तथ्य यह है कि मानव मन एक ही तरीके से काम करता है। इस से हम पुन: आश्वस्त होते है कि जिन चीजों से हमें आनन्द मिलता है, वे विश्व के हर भाग में लोगों को आनन्द प्रदान करती है। हम सब का साझा हित है और इस तथ्य से इस बात को बल मिलता है कि हमारी एक साझी परम्परा है”। वह एक महान वैज्ञानिक, एक कुशल अध्यापक और दुर्जेय विद्वान था।ChandraNobel.png

सुब्रामन्यिन चन्द्रशेखर का जन्म लाहोर मे 19 अक्तूबर , 1910 को हुआ। उसके पिता सुब्रामन्यिन आयर सरकारी सेवा मे थे। सी.वी.रमन, विज्ञान में पहले भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेता चन्द्रशेखर के पिता के छोटे भाई थे। चन्द्रशेखर का बाल्य जीवन मद्रास (अब चेन्नई) में बीता। ग्यारह वर्ष की आयु में मद्रास प्रेसिडेंसी कालेज में उसने दाखिला लिया जहां पहले दो वर्ष उसने भौतिकी, कैमिस्टरी, अंगरेजी और संस्कृत का अध्ययन किया। चन्द्रशेखर ने 31, जुलाई 1930 को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड का प्रस्थान किया और इस प्रकार एक लबां और शानदार वैज्ञानिक कैरियर आंरभ किया जो 65 वर्षों तक विस्तृत था। पहले छ: वर्षों को छोड़, उसने शिकागो विश्वविद्यालय मे काम किया।

अपनी शानदार खोज ‘चन्द्रशेखर सीमा’ के लिए वह अत्यधिक प्रसिद्ध है। उसने दिखाया कि एक अत्याधिक द्रव्यमान है जिसे इलेकट्रानों और परमाणु नाभिकों द्वारा बनाये दाब द्वारा गुरुत्व के विरुद्ध सहारा दिया जा सकता है। इस सीमा का मान एक सौर द्रव्यमान से लगभग 1.44 गुणा है। 1930 में चन्द्रशेखर ने इसकी व्युपत्ति की जबकि वह एक विद्यार्थी ही था। तारकीय विकास की जानकारी प्राप्त करने में चन्द्रशेखर सीमा एक निर्णायक भूमिका निभाती है। यदि एक तारे का द्रव्यमान इस सीमा से बढ़ता है, तो तारा एक सफ़ेद बौना नहीं बनेगा। यह गुरुत्वाकर्षण की शक्तियों के अत्यधिक दाव के अन्तर्गत टूटता रहेगा। चन्द्रशेखर सीमा के प्रतिपादन के फलस्वरूप न्यूट्रोन तारों और काले गड्ढों का पता चला। यह नोट किया जाए कि तारे स्थिर होते हैं और वे समाप्त नहीं होते क्योंकि भतीरी दाब परमाणु नाभिकों और इलैक्ट्रानों के तापीय संचालन और नाभकीय प्रतिक्रियाओं द्वारा उत्पन्न विकिरण के दाब से भी गुरुत्व को सन्तुलित करते हैं। तथापि, प्रत्येक तारे के लिए एक ऐसा समय आयेगा जब नाभकीय प्रतिक्रियाएं बन्द हो जाएगी और इसका अर्थ यह होगा कि गुरुत्व-कर्षण का मुकाबला करने के लिए भीतरी दाब नहीं होंगे। द्रव्यमान के आधार पर एक तारे के तीन संभावित चरण होते हैं – सफ़ेद बोना, न्यूट्रान तारा और काले गड्ढे। चन्द्रशेखर को संयुक्त रूप से नाभकीय खगोल भौतिकी डब्ल्यू.ए.फाउलर के साथ 1983 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। चूंकि चन्द्रशेखर सीमा के कारण चन्द्रशेखर प्रसिद्ध है इसलिए उसके लिए कोई सीमा नहीं थी। जैसा पहले बताया गया है उसके काम के विस्तार में भौतिक – विज्ञान, खुगोल – भौतिक औप व्यावहारिक गणित शामिल हैं। उसके अपने शब्दों में “मेरे जीवन में सात काल आये और वे संक्षिप्त रूप से हैं
तारकीय ढांचा, सफ़ेद बौनों के सिद्धांत सहित (1929-39)
तारकीय गतिक, ब्राउमीन संचलनों के सिद्धांत सहित (1938-473)
विकिरणी अन्तरण का सिद्धांत, प्रदीप्ति और सौर प्रकाशित आकाश के ध्रुवण का सिद्धांत, गृहीय और तारकीय वातावरण के सिद्धांत और हाइड्रोजन के नकारात्मक आयन का परिमाण सिद्धांत
हाइड्रो-गतिक और हाइड्रो-चुंबकीय स्थिरता (1952-61)
साम्यावस्था की दीर्घवृत्तजीय आकृतियों का सन्तुलन और स्थायित्व। (1961-68)
सापेक्षता और आपेक्षिकीय खगोल-भौतिकी के सामान्य सिद्धांत (1962-71)
काले गड्ढों का गणितीय सिद्धांत (1974-73)”

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उसका अनुसाधान उत्पादन अपूर्व है और चन्द्रशेखर द्वारा प्रकाशित प्रत्येक मोनोग्राफ या पुस्तक गौरवग्रन्थ बन गए हैं। संबंधित क्षेत्रों का कोई भी गम्भीर विद्यार्थी चन्द्रशेखर के काम की उपेक्षा नहीं कर सकता। वह किसी एकल समस्या से नहीं बल्कि इस इच्छा से प्रेरित था कि समस्त क्षेत्र पर सापेक्ष महत्व या महत्वहीनता के बारे में वह कभी चिन्तित नहीं था। उसे इस बात की जरा भी चिन्ता नहीं थी कि उसका काम उसके लिए प्रसिद्धि और मान्यता लाने वाला है। उसने कहा : “ पहले तैयारी के वर्षों के बाद, मेरा वैज्ञानिक कार्य एक निश्चित पैटर्न पर चला है जो मुख्यतः संदर्शो की तलाश द्वारा प्रेरित है। व्यवहार में इस खोज में एक निश्चित क्षेत्र का मेरे द्वारा ( कुछ जांचों और कष्टों के बाद) चयन शामिल है जो संवर्धन के लिए परीक्षणीय दिखाई दिया और मेरी रूचि, मिजाज और योग्यताओं के अनुकूल था। और जब कुछ वर्षों के अध्ययन के बाद, मैं महसूस करता हूँ कि मै ने ज्ञान की पर्याप्त मात्रा संचित कर ली है और मैंने अपना दृष्टिकोण प्राप्त कर लिया है तो मेरी इच्छा है कि अपने दृष्टिकोण को मैं नए सिरे से सुसंगत तरीके से क्रम, रूप और ढांचे को प्रस्तुत करूँ ”।

एक बार जब वह एक विशेष क्षेत्र समाप्त कर लेता था तो एक नए क्षेत्र पर काम आरंभ करने के लिए तैयार हो जाता था। चन्द्रशेखर के वैज्ञानिक जीवन का सार था ‘एक क्षेत्र की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना, पूर्णरूप से समझ लेना और उसे आभ्यन्तर रूप देना’।

जो कुछ भी उसने किया, उसने प्रतीय लाजवाब सतर्कता के साथ ही नहीं बल्कि सुरुचिपूर्ण ढंग से किया। लिमनान स्पिटजर ने कहा, “चन्द्रशेखर के लैक्चर को सुनना और उससे सैद्धांतिक ढांचों के विकास का अध्ययन करना एक लाभप्रद और सौन्दर्यपरक अनुभव होता है।
आनन्द आदेश देता है और उन्हें पैराग्राफों में बांट देता है। क्या वे उन्हें छोटा या लंबा बनाते हैं ? उदाहरणार्थ, एक पैरा के लिए केवल एक ही वाक्य का प्रयोग करने, या एक अंतिम वाक्य का विचार जिसमें न तो कर्ता है और न ही कर्म। केवल चन्द शब्द ………….. इस प्रकार यह है …………. या कोई छोटा वाक्यांश जैसे वह। मैं ऐसी युक्तियों को जानबूझ कर अपनाता हूँ ”।

विज्ञान में पूरी तरह अन्ग्रस्त होते हुए भी, उसकी अन्य विषयों में भी दिलचस्पी थी आरंभ से ही उसकी साहित्य में रूचि थी। उसने कहा, “ वर्ष 1932 के आसपास कैम्ब्रिज में साहित्य में मेरी गम्भीर रुचि उत्पन्न हुई। उस समय मेरे लिए वास्तविक खोज रूसी लेखक थे। मैंने योजनाबद्ध तारीके से टर्गनेव के सब उपन्यास , दास्तोवस्की के क्राइम एंड पनिशमेंट, ब्रर्दस कारमाजोव, और पोसेस्ड उपन्यास कांस्टांस गार्नेट अनुवाद में पढ़े। शैकव की सब कहानियों और नाटकों को पढ़ा। टालस्टाय के सब तो नहीं लेकिन अन्ना केरनीना जरूर पढ़ा। अंग्रेजी लेखकों में से मैंने विरजीना वुल्फ, टी एस ईलियट, थामस हार्डी, जॉन गाल्सवर्दी और बर्नाडशा को पढ़ना आरंभ किया। हेनरिक इबसेन भी मेरे प्रिय लेखकों में से एक था।

दूसरों में परिश्रम के लिए उत्साह उत्पन्न करने की चन्द्रशेखर में विलक्षण योग्यता थी। उसके मार्गदर्शन मे 50 से ज्यादा विद्यार्थीयों ने PHD कार्य किया। अपने विद्यार्थीयों के साथ उसके संबंध हमें पुराने जमाने की गुरू शिष्य परंपरा की याद दिलाते है। विद्यार्थीयों से वह आदर प्राप्त करता था लेकिन वह उन्हें उत्साहित भी करता था कि वे अपने दृष्टिकोण निर्भिक हो कर रखें। उसने कहा : “मेरे विद्यार्थी, ऐसे विद्यार्थी जिनके साथ मैंने निकट से काम किया है, वे एक प्रकार से श्रद्धालू है जो पुराने जमाने की याद दिलाते है जिन्हें हम पुस्तकों में पढ़ते हैं। इसके साथ ही जो मैं कहता हूँ उससे वे बिल्कुल भयभीत नहीं होते। उनकी प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी या नकारात्मक, वे चर्चा करते हैं और तर्क वितर्क भी करते हैं। जो आप कहते हैं यदि कोई व्यक्ति उससे पूरी तरह सहमत होता है तो विचार – विमार्श का कोई बिन्दु नहीं होती ”।

अपने समग्र व्यावसयिक जीवन में जवान लोगों के साथ उसने अन्योन्य क्रिया बनाए रखी। एक बार उसने कहा : “ मैं आसानी से कल्पना कर सकता हूँ कि यदि मैंने फार्मी या वॉन न्यूमान के साथ काम नहीं किया तो कुछ भी नहीं खोया, लेकिन अपने विद्यार्थीयों के बारे में मैं वैसी बात नहीं कर सकता ”।
वह 1952 से 1971 तक खगोल-भौतिकी पत्रिका का प्रबन्ध सम्पादक रहा। शिकागो विश्वविद्यालय की एक निजी पत्रिका को उसने अमेरिकन एस्ट्रोनामीकल सोसाइटी की एक राष्ट्रीय पत्रिका के रूप में परिवर्तित कर दिया। पहले बारह वर्षों तक पत्रिका की प्रबन्ध – व्यवस्था चन्द्रशेखर और एक अंश कालिक सचिव के हाथ में थी। “हम मिलजुल कर सारे नेमी काम करते थे। हमने वैज्ञानिक पत्राचार पर ध्यान दिया। हम बजट, विज्ञापन और पृष्ठ प्रभार तैयार करते थे। हम री – प्रिंट आर्डर देते थे और बिल भेजते थे ”। जब चन्द्रशेखर सम्पादक बना तो पत्रिका वर्ष मे छः बार निकलती थी और कुल पृष्ठ संख्या 950 थी लेकिन चन्द्रशेखर के सम्पादकत्व की समाप्ति के समय पत्रिका वर्ष में चौबीस बार प्रकाशित होती थी और कुल पृष्ठ संख्या 12,000 थी। उसके नेतृत्व में पत्रिका शिकागो विश्वविद्यालय से वित्तीय रूप से स्वतन्त्र हो गई। उसने पत्रिका के लिए अपने पिछे 500,000 यू एस डालर की आरक्षित निधि छोडी।
चन्द्रशेखर मुख्यतः विदेश में और वहीं काम किया। 1953 में वह अमरीकी नागरिक बना गया। तथापि भारत की बेहतरी की उसे गहरी चिन्ता थी। भारत में बहुत से विज्ञान संस्थानों और जवान वैज्ञानिकों के साथ उसका गहरा संबंध था। अपने बचपन में उसे रामानुजम के विज्ञान के प्रति सम्पूर्ण समपर्ण के उदाहरण से प्रेरणा मिली थी। रामानुजम में उसकी दिलचस्पी जीवन भर बनी रही। 1940 के उत्तर्राध में मद्रास में रामानुजम इंस्टीच्यूट ऑफ मैथिमैटिक्स स्थापित करने में सहायक की भूमिका अदा की और जब इंस्टीच्यूट को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा तो उसने इस मामले को नेहरूजी के सामने रखा। रामानुजम की विधवा जो गरीबी की हालत में रह रही थी, उसके लिए पेंशन राशि में वृद्धि कराने की व्यवस्था की। रिचर्ड आस्के द्वारा रामानुजम की अर्धप्रतिमाएं ढलवाने के लिए भी वह उत्तरदायी था।
विज्ञान की खोज में लगे रहने में चन्द्रशेखर के लिए क्या प्रेरणा थी ? उसके एक विद्यार्थी यूवूज़ नूटकू ने कहा: “ हर समय सीखते हुए चन्द्र संस्थापन के बारे में तनिक भी चिन्ता नहीं करता था। जो कुछ उसने किया वह इस लिए किया क्योंकि वह उपजाऊ तरीके से जिज्ञासु था। उसने केवल एक कारण से ही यह किया – इससे उसे शांति और आन्तरिक शान्ति मिलती थी ”।

जो विज्ञान की खोज में लगे हैं या ऐसा करने की योजना बना रहे हैं उनके लिए हम चन्द्रशेखर को उद्धृत करते हुए इसे समाप्त करना चाहेगें। “ विज्ञान की खोज की तुलना कई बार पर्वतों ऊँचे लेकिन ज्यादा ऊँचें नहीं, के आरोहण के साथ की गई है। लेकिन हममें से कौन आशा, या कल्पना ही, कर सकता है कि असीम तक फैली एवरेस्ट पर चढ़ाई करे और उसके शीर्ष पर पहुंचे जब कि आकाश नीला हो और हवा रूकी हुई हो और हवा की स्तब्धता में बर्फ के सफे़द चमकीलेपन में समस्त हिमालय घाटी का सर्वेक्षण करे। हम में से कोई अपने इर्द गिर्द विश्व और प्रकृति के तुलनात्मक दृष्टि के लिए आशा नहीं कर सकता। लेकिन नीचे घाटी में खड़े होना और कंचनजंगा के ऊपर सूर्योदय होने की प्रतीक्षा करने में कुछ भी बुराई या हीनता नहीं है”।
चन्द्रशेखर का निधन 21 अगस्त, 1995 को हुआ।

सौजन्य से -ड्रीम 2047,लेखक -सुबोध महंती

विराट एवं प्रसारी ब्रह्माण्ड : एक परिचय


by-pradeep kumar
हम जिस ब्रह्मांड में आवास करते हैं ,आज हम सभी को उसकी विशालता का अनुमान हैं । आज हम जानते हैं कि जिस जिस पृथ्वी पर हम आवास एवं विचरण करते हैं ,वह ब्रह्माण्ड तथा सौरमंडल का एक छोटा-सा भाग हैं । पृथ्वी सौर -परिवार का एक सदस्य हैं ,जिसका मुखिया सूर्य हैं । सूर्य पृथ्वी पर जीवो के शक्ति का एक प्रमुख स्रोत हैं । सौरमंडल का स्वामी होने के बावजूद सूर्य भी विशाल आकाशगंगा-दुग्धमेखला नाम की मंदाकिनी का एक साधारण और औसत तारा हैं । सूर्य 25 Km/S की गति से आकाशगंगा के केंद्र के चारो तरफ परिक्रमा करता हैं । आकाश-गंगा की एक परिक्रमा को पूरी करने में सूर्य को लगभग 25 करोड़ साल लगते हैं । 25 करोड़ साल की इस लम्बी आवधि को ब्रह्माण्ड-वर्ष या कॉस्मिक-इयर (Cosmic-Year) के नाम से जाना जाता हैं । पृथ्वी पर मनुष्य के सपूर्ण अस्तित्व-काल में सूर्य ने आकाश-गंगा की एक भी परिक्रमा पूरी नही की हैं । परन्तु कुछ चमकते पिंडो को ही देखकर मनुष्य की उत्कंठा शांत नही हुई । आज से सदियों पूर्व जब आज की तरह वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान उपलब्ध नही था ,फिर भी हमारे पूर्वजो ने उच्चस्तरीय वैज्ञानिक खोजें की । इनमे आर्यभट ,टालेमी ,अरस्तु,पाईथागोरस ,भास्कर इत्यादि खगोल-विज्ञानियों का नाम अग्रणी हैं । इन खगोल-वैज्ञानिको ने सूर्य,पृथ्वी,चन्द्रमा ,ग्रहों,उपग्रहों के गति का जो अध्ययन किया ,वह आज भी तथ्यपरक एवं सटीक हैं । इस आधार पर हम यह कह सकते हैं ,कि खगोलशास्त्र विज्ञान की सबसे पुरानी शाखा हैं । विज्ञान एवं तकनीकी विकास जितनी अधिक होती गयी ,उतनी ही मनुष्य की उत्सुकता बढ़ती चली गई । पहले इस शाखा को बहुत कम महत्व दिया जाता था क्योंकि ब्रह्माण्ड-विज्ञान के अध्ययन करने से न तो भौतिक लाभ होता था और न ही कोई आर्थिक मदद । लेकिन बीसवी सदी तक आते-आते यह शाखा अत्यंत उन्नत तथा मजबूत हो गई ।

जैसाकि हम जानते हैं ,कि ब्रह्माण्ड मन्दाकिनियो का अत्यंत विराट एवं विशाल समूह हैं । यहाँ पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं कि इतना विराट ब्रह्माण्ड कब ? कैसे ? और किससे उत्पन्न हुआ ? ब्रह्माण्ड इतना विशाल क्यों हैं ? यह कितना विशाल हैं ? क्या यह गतिशील हैं या स्थिर ? ब्रह्माण्ड में कुल कितना द्रव्यमान हैं ? क्या इसका कुल द्रव्यमान सीमित हैं या अनंत ? ब्रह्माण्ड कब तक फैलता रहेगा ? ब्रह्माण्ड का भविष्य क्या होगा ? इसका अंत कैसे होगा ? वैगरह-वैगरह ।
ब्रह्माण्ड से समन्धित उपरलिखित प्रश्नों के उत्तर पाना हमेशा से ही कठिन रहा हैं ! कोई यह नही बता सकता कि ब्रह्माण्ड का पहले जन्म हुआ या फिर उसके जन्म देने वाला का ? यदि पहले ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ तो उसके जन्म से पहले उसका जन्म देने वाला कहाँ से आया ? आपके समक्ष प्रस्तुत इस लेख में इन्ही मूल-प्रश्नों के उत्तर ढूढने की एक सामान्य तथा छोटी सी कोशिश की गई हैं ।
ब्रह्माण्ड क्या हैं ?
वास्तविकता में ब्रह्माण्ड के विषय में वैज्ञानिको को भी बहुत कम जानकारी हैं । ब्रह्माण्ड के बारे में बहुत कुछ अनुमानों के आधार पर वैज्ञानिकों ने अपने मत प्रस्तुत कियें हैं । रात में आकाश की ओर देखे तो दूर-दूर तक हमे तारें ही तारें दिखाई देते हैं दरअसल यही आसमान ब्रह्माण्ड का एक छोटा -सा भाग हैं । पूरा ब्रह्माण्ड हमे दिखाई दे ही नही सकता ,इतना असीम कि हमारी नज़रे वहाँ तक पहुँच ही नही सकती । विश्व-प्रसिद्ध खगोलशास्त्री फ्रेड-होयल के अनुसार ब्रह्मांड सब-कुछ हैं । अर्थात् अंतरिक्ष,पृथ्वी तथा उसमे उपस्थित सभी खगोलीय पिण्डो,आकाशगंगा ,अणु और परमाणु,आदि को समग्र रूप से ब्रह्माण्ड कहते हैं । सब-कुछ समेट लेना ब्रह्माण्ड का एक विशेष गुणधर्म हैं । ब्रह्मांड से समन्धित अध्ययन को ब्रह्माण्ड-विज्ञान (Cosmology) कहते हैं । ब्रह्मांड इतना विशाल हैं कि इसकी हम कल्पना नही नही कर सकते ,अरबो-खरबों किलोमीटर लम्बा-चौड़ा मालूम होता हैं । ब्रह्माण्ड की दूरियाँ इतनी अधिक होती हैं ,कि उसके लिए हमे एक विशेष पैमाना निर्धारित करना पड़ा-प्रकाश बर्ष । दरअसल प्रकाश की किरणें एक सेकेंड में लगभग तीन लाख किलोमीटर की दूरी तय करती हैं । इस वेग से प्रकाश-किरणें एक बर्ष में जितनी दूरी तय करती हैं ,उसे एक प्रकाश-बर्ष कहते हैं । इसलिए एक प्रकाश-बर्ष 94 खरब,60 अरब,52 करोड़ ,84 लाख ,5 हजार किलोमीटर के बराबर होती हैं । सूर्य हमसे 8 मिनट और 18 प्रकाश सेकेंड दूर हैं । तारों ,ग्रहों और आकाशगंगाओं की दूरिया नापने के लिये एक और पैमाने का इस्तेमाल होता हैं ,जिसे पारसेक कहते हैं । एक पारसेक 3.26 प्रकाश-बर्षों के बराबर हैं । सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी को एस्ट्रोनोमीकल-यूनिट या खगोलीय इकाई कहते हैं ।
आधुनिक खगोलशास्त्र की शुरुवाती दो अवधारणाऍ
आधुनिक खगोलशास्त्र के विकास में जिन दो शुरुवाती ब्रह्मांडीय सिधान्तो ने योगदान दिया हैं ,उनका संक्षिप्त विवरण निम्न हैं –
पहला भूकेंद्री सिधांत(Geocentric theory ) :- सन् 140 ई ० में टालेमी ने ब्रह्माण्ड का अध्ययन किया और निष्कर्ष में उन्होंने भू-केंद्री सिधांत प्रतिपादित किया । इस सिधांत के अनुसार पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केंद्र में स्थित हैं एवं सूर्य तथा अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं ।
दूसरा सूर्यकेंद्र सिधांत ( Heliocentric theory ):- सन् 1543 में पोलैंड के पादरी एवं खगोलशास्त्री निकोलस कोपरनिकस (1473-1543 ) ने सूर्यकेंद्री सिधांत का प्रतिपादन किया । इस सिधांत के अनुसार सूर्य ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित हैं तथा पृथ्वी सहित अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं । जोकि हमारे सौर-मंडल के लिये सत्य हैं !
जिस समय कोपरनिकस ने उपरोक्त सिधांत (सूर्य-केंद्री ) दिया था ,उस समय शायद पूरे विश्व (भारत तथा कुछ अन्य देशों को छोड़कर )में टालेमी और अरस्तु के सिधांतो का बोलबाला था । टालेमी के सिधान्तो को धार्मिक रूप से भी अपना लिया गया था । अत: धार्मिक-प्रताड़ना के डर से कोपरनिकस ने अपने इस सिधांत को उन्होंने अपने अंतिम दिनों में पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया । बाद में चर्च ने इस पुस्तक को जब्त कर लिया ,तथा इन विचारों को प्रचारित तथा प्रसारित करने से मनाकर दिया गया । बाद में किसी तरह से एक रोमन प्रचारक ज्योदार्न ब्रूनो को कोपरनिकस की पुस्तक हाथ लग गयी और उसका अध्ययन किया और कोपरनिकस के सिधांत का समर्थन भी । ब्रूनो ने इस सिधांत का प्रचार पूरे रोम में कर दिया । कट्टरपंथी एवं धार्मिक रुढ़िवादियों के लिए यह असहनीय था । अंतत: ब्रूनो को रोम में जिन्दा जला दिया गया ! ”क्या-क्या सितम न सहे इन्होने सत्य की खातिर ”
आइन्स्टाइन ने अंतरिक्षीय अवधारणा को बदला

आइन्स्टीन से पहले समय को ‘निरपेक्ष ‘ माना जाता था ! आइन्स्टाइन ने निरपेक्ष समय की अवधारणा को भी अस्वीकार कर दिया ! उनका तर्क यह था की सभी प्रेक्षको का अपना ‘अब’ होता हैं ! समय निरपेक्ष हैं जिस समय प्रेक्षक ‘अब’ कहता हैं वह सारे ब्रह्मांड के लिए लागू नही होता हैं ! एक ही ग्रह पर स्थित दो प्रेक्षक घड़ी मिलाकर या संकेत द्वारा अपनी निर्देश-पद्धति में समानता ला सकते हैं ,लेकिन यह बात उनके सापेक्ष एक गतिशील प्रेक्षक के विषय में लागू नही हो सकती !
यदि आप एक अंतरिक्ष-यात्री हैं और आप पृथ्वी की घड़ियो के मुताबिक 50 साल की अंतरिक्ष-यात्रा पर जाये और इतनी तेज़ गति से यात्रा करे कि अंतरिक्ष-यान के घड़ियो के अनुसार केवल एक महिना ही लगे तो जब आप अंतरिक्ष यात्रा से वापस लौटकर आओगे तब आप एक महीना ही ज्यादा बड़े लगेंगे । लेकिन पृथ्वी के लोग 50 साल बड़े हो जायेंगे । कल्पना कीजिये कि स्पेस-ट्रेवल पर जाते वक्त आप 30 साल के हो और आप छोटा बच्चा छोड़कर जायें तो लौटने पर सापेक्षता-सिधांत के मुताबिक आपका पुत्र (बच्चा ) आपसे उम्र में 20 साल बड़ा होगा । यह बात हमे बहुत अजीब लगता हैं क्योंकि यह सामान्य -बुद्धि के विपरीत हैं !
स्थैतिक-ब्रह्माण्ड की अवधारणा
हम देखते हैं ,कि आकाश में न तो फैलाव होता और न ही संकुचन तो हम आकाश को स्थिर आकाश कहते हैं जोकि पूरे ब्रह्माण्ड के लिए लागू हैं । क्या सचमुच में यह पूरे ब्रह्माण्ड के लिए लागू हैं ? परन्तु इसका अर्थ हैं कि ब्रह्माण्ड का आकार सीमित हैं तथा इसका कुल द्रव्यमान निश्चित एवं सीमित हैं ।इस आधार पर कोई व्यक्ति यह मानेगा कि ब्रह्माण्ड का आकार बड़ा हैं इसलिए इसका द्रव्यमान अनंत हैं । न्यूटन ने आकाश में साफ़-साफ़ अपने जगह पर स्थिर देखकर स्थिर ब्रह्माण्ड की परिकल्पना की ,लेकीन तारों को अपनी जगह स्थिर रहने का कारण वे खोज नही पाए । लेकिन ठहरिये ! यदि हम ब्रह्माण्ड को स्थिर (सीमित ) मान लें ,तो ब्रह्माण्ड के सीमा का अंत कहाँ पर हैं ? इसके सीमा के अंत के पार क्या हैं ? तो ब्रह्माण्ड के परिभाषा के अनुसार ”सबकुछ समेट लेना ब्रह्माण्ड का गुणधर्म हैं ” इसके हिसाब से इसके सीमा के अंत के पार को भी हमे ब्रह्माण्ड में शामिल कर लेना चाहिए ?
इन सबके बावजूद सर्वकालीन महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन (Albert Einstein) ने स्थिर तथा सीमित ब्रह्माण्ड की परिकल्पना को नही नाकारा ! और उन्होंने इस बात पर यह तर्क दिया ,कि ब्रह्माण्ड का द्रव्यमान समयानुसार अपरिवर्तित मिनटरहता हैं । आइन्स्टीन को अपने गुरुत्व-क्षेत्र सिधांत में स्थिर ब्रह्माण्ड का कोई संकेत न मिलने के बावजूद उसके समर्थन में उन्होंने अपने ही समीकरण को संसोधित कर डाला ,उन्होंने समीकरण में ब्रह्माण्डीय-नियतांक जोड़कर उसे परिवर्तित कर दिया ताकि उनके द्वारा जोड़ा गया ब्रह्माण्डीय नियतांक आकर्षण बल के विपरीत प्रतिकर्षण का काम करके ब्रह्माण्ड को स्थिर रख सके । बाद में उन्होंने स्वयं इसे गलत माना !
प्रसारी ब्रह्माण्ड

सन् 1922 में रुसी खगोलशास्त्री और गणितज्ञ अल्कजेण्डर फ्रीडमैन ने अपने सैधांतिक खोजो के आधार पर पता लगाया कि आइन्स्टीन का स्थिर ब्रह्माण्ड की अवधारणा आस्वीकार्य हैं , परन्तु उन्होंने ब्रह्माण्ड के गतिशील होने की बात रखी और उन्होंने तर्क दिया कि ब्रह्माण्ड का स्थैतिक अवस्था में रहना नामुमकिन हैं । उन्होंने पाया कि आइन्स्टीन के समीकरणों के अनुसार ब्रह्माण्ड का द्रव्यमान बढ़ना चाहिये या घटना चाहिये पर यह समयानुसार सुनिश्चित नही रह सकता । उन्होंने पाया कि आइन्स्टीन का समीकरण स्थिर-ब्रह्माण्ड के समर्थन में कोई भी संकेत नही देता हैं । अत: फ्रीडमैन ने यह निष्कर्ष निकाला कि हमारा ब्रह्माण्ड स्थिर नही ,गतिशील हैं ।


फ्रीडमैन के खोज के लगभग 7 वर्ष बाद ,एडविन पी० हब्बल ने 1929 में ब्रह्माण्ड के विस्तारित होने के पक्ष में प्रभावी तथा रोचक सिधांत रखा । हब्बल ने ही हमे बताया कि ब्रह्माण्ड में हमारी आकाशगंगा की तरह लाखोँ अन्य आकाशगंगाएं भी हैं ! उन्होंने अपने प्रेक्षणों से यह निष्कर्ष निकाला कि आकाशगंगाएं ब्रह्माण्ड में स्थिर नही हैं ,जैसे-जैसे उनकी दूरी बढ़ती जाती हैं वैसे ही उनके दूर भागने की गति तेज़ होती जाती हैं । इस तथ्य को एक ही तरह समझाया जा सकता हैं -यह मानकर कि आकाशगंगाएं बहुत बड़े वेग यहाँ तक प्रकाश तुल्य वेग के साथ हमसे दूर होती जा रही हैं ।
आकाशगंगाएं दूर होती जा रही हैं ,तथा ब्रह्माण्ड फ़ैल रहा हैं । यह डॉपलर प्रभाव द्वारा ज्ञात किया गया हैं । सभी आकाशगंगाओं के वर्ण-क्रम की रेखाएँ लाल सिरे की तरफ सरक रही हैं यानी वे पृथ्वी से दूर होती जा रही हैं ,यदि आकाशगंगाएं पृथ्वी के समीप आ रही होती हैं ,तो बैगनी-विस्थापन होता हैं । अत: आज अनेकों तथ्य यह इंगित कर रहे हैं ,कि ब्रह्माण्ड प्रकाशीय-वेग के तुल्य विस्तारमान हैं ठीक उसी प्रकार जिस तरह हम गुब्बारे को फुलाते हैं तो उसके बिंदियो के बीच दूरियों को हम बढ़ते देखते हैं । सन् 2011 में नोबेल-पुरस्कार से सम्मानित तीन खगोल-वैज्ञानिकों (साउल पर्लमुटर(Saul Perlmutter) ,एडम रीज (Adam G. Riess) और ब्रायन स्कमिड्ट( Brian P. Schmidt) ने निष्कर्ष निकाला ,कि ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति में त्वरण आ रहा हैं ! यानी ब्रह्माण्ड समान नही बल्कि त्वरित गति से फ़ैल रहा हैं । इसके त्वरित होने का मुख्य कारण श्याम ऊर्जा हैं ! यानी श्याम ऊर्जा ब्रह्माण्ड के विस्तार को गति प्रदान कर रही हैं !
हब्बल के निष्कर्ष के अनुसार किसी आकाशगंगा का वेग निम्न सूत्र द्वारा निकाला जा सकता हैं –
आकाशगंगा का वेग = ह्ब्बल-स्थिरांक x दूरी ( V=H d )
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई ? इस प्रश्न के उत्तर स्वरूप वैज्ञानिको की अनोखी मान्यता हैं (यह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का सबसे ज्यादा माना जाने वाला सिधांत हैं ) । इस सिधांत को महाविस्फोट का सिधांत या बिग-बैंग के नाम से जाना जाता हैं । इस सिद्धांत का प्रतिपादन जार्ज लेमितरे (georges lemitre) नामक एक खगोलशास्त्री ने किया था । सिधान्त के अनुसार , प्रारम्भिक रूप से एक सेंटीमीटर के आकार की एक अत्यंत ठोस और गर्म गोली थी । अचानक एक विस्फोट के कारण यह सम्पूर्ण तक विस्फोटित होती चली गई । यह हमारा ब्रह्माण्ड उसी गोली में निहित था । इस महाविस्फोट से अत्याधिक गर्मी और सघनता फैलती चली गई । कुछ वैज्ञानिक मानते है ,यह महाविस्फोट 15 अरब वर्ष पूर्व हुआ था । इसी से सारे मूलभूत कणों(इलेक्ट्रान, प्रोटान, फोटान इत्यादि) ,उर्जा की उत्पत्ति हुई थी । यह मत भी प्रकट किया गया कि मात्र एक सेकेंड के दस लाखवे भाग में इतना बड़ा विस्फोट हुआ और अरबो किलोमीटर तक फैलता चला गया । उसके बा। द से इसका निरन्तर विस्तार होता रहा और इसका विस्तार कहाँ तक हुआ यह अनुमान लगाना सम्भव नहीं हैं ?? ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम हीलियम तथा हाइड्रोजन तत्वों का निर्माण हुआ यही कारण हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में 90 प्रतिशत हाइड्रोजन तथा 8 प्रतिशत हीलियम पाया जाता हैं शेष 2 प्रतिशत में अन्य सभी तत्व आते हैं । लेकिन हमारे पास बिग-बैंग को मानने के क्या सबूत हैं ? इसका सबसे बड़ा सबूत हैं हब्बल का नियम यानीं सभी आकाशगंगाए हमसे दूर होती जा रही हैं ,इसलिए अतीत में पूरे ब्रह्माण्ड का समस्त द्रव्य एक ही जगह पर एकत्रित रहा होगा । बिग-बैंग हमे यह नही समझता कि आकाशगंगाओं , ग्रहों तथा विशाल आकर के खगोलीय पिंडो की उत्पत्ति कैसे हुई ? खगोल-विज्ञानियों के अनुसार आकाशगंगाओं ,तारों,उल्कापिंडो इत्यादि की उत्पत्ति बिग-बैंग के लगभग एक करोड़ वर्ष बाद हुई । बिग-बैंग हमे यह भी नही समझाता कि यह महाविस्फोट आखिर क्यों हुआ ??
ब्रह्माण्ड कब तक फैलता रहेगा ? उसका फैलाव उसे कहाँ तक ले जायेगा ?
वर्तमान में ब्रह्माण्ड के फैलाव तथा अंत के विषय में चार प्रमुख सम्भावनाएं व्यक्त की गई हैं ।
1) महा-विच्छेद ( The Big Rip ) : इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड तब तक विस्तारित होता रहेगा जब तक प्रत्येक परमाणु टूट कर इधर-उधर फ़ैल नही जायेगा । यह ब्रह्माण्ड के अंत का सबसे भयानक घटना होगी लेकिन ब्रह्मांड को इस अवस्था में देखने के लियें हम जीवित नही रहेंगे क्योंकि इस अवस्था तक पहुचने से पहले से हमारी आकाशगंगा ,ग्रह और हम नष्ट हो चुके होंगे । वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना आज से लगभग 23 अरब बाद होगी ।
2) महा-शीतलन (The Big Freeze) : इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड के विस्तार के कारण सभी आकाशगंगाएँ एक दूसरे से दूर चले जायेगीं तथा उनके बीच कोई भी समंध नही रहेगा । इससे नयें तारों के निर्माण के लियें गैस उपलब्ध नही होगा ! इसका परिणाम यह होगा कि ब्रह्माण्ड में उष्मा के उत्पादन में अत्याधिक कमी आयेगी और समस्त ब्रह्माण्ड का तापमान परम-शून्य (Absolute Zero) तक पहुँच जायेगा । और महा-शीतलन के अंतर्गत हमारे ब्रह्माण्ड का अंत हो जायेगा । वैज्ञानिको के अनुसार यह ब्रह्माण्ड के अंत की सबसे अधिक सम्भावित अवस्था हैं कुछ भी हों लेकिन यह भी पूरी तरह से निश्चितता से नही कहा जा सकता कि इसी अवस्था से ब्रह्माण्ड का अंत होगा ।
3) महा- संकुचन(The Big Crunch) : इस सम्भावना के अनुसार एक निश्चित अवधि के पश्चात् इसके फैलाव का क्रम रुक जायेगा और इसके विपरीत ब्रह्माण्ड संकुचन करने लगेगा अर्थात् सिकुड़ने लगेगा और अंत में सारे पदार्थ बिग-क्रंच की स्थिति में आ जायेगा । उसके बाद एक और बिग-बैंग होगा और दूबारा ब्रह्माण्ड का जन्म होगा । क्या पता कि हमारा ब्रह्माण्ड किसी अन्य ब्रह्माण्ड के अंत के पश्चात् अस्तित्व में आया हो ?
4) महाद्रव -अवस्था(The Big Slurp) : इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड स्थिर अवस्था में नही हैं । और हिग्स-बोसॉन ने ब्रह्माण्ड को द्रव्यमान देने का काम किया हैं । जिससे यह सम्भावना हैं कि हमारे ब्रह्माण्ड के अंदर एक अन्य ब्रह्माण्ड का जन्म हो और नया ब्रह्माण्ड हमारे ब्रह्माण्ड को नष्ट कर देगा ।
क्या हमने उपरलिखित सभी प्रश्नो के उत्तर पा लिया है ? नहीं ! हम किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं ढ़ूंढ़ पायें है इससे यह साबित होता है कि ब्रह्माण्ड के बारे मे कोई भी सिद्धांत संपूर्ण नहीं हैं । हब्बल के मत से खगोलशास्त्री आइजक असिमोव सहमत नहीं हैं । साथ-ही-साथ फ्रेड-होयल और भारतीय खगोलशास्त्री जयंत विष्णु नार्लीकर बिग़-बैंग तथा ब्रह्माण्ड के अंत से समन्धित कोई भी सिद्धांत सही नही माना हैं और इस पर उन्होंने अपना नया सिधांत प्रस्तुत किया हैं ! शायद यही विज्ञान हैं प्रश्नों के जवाब देती और जवाबों को नये प्रश्न !

साइंटिफिक वर्ल्ड में पूर्व प्रकाशित 

आइन्स्टाइन,अंतरिक्ष और सापेक्षता भाग-3


by-प्रदीप कुमार

सापेक्षता का विशेष सिधांत 
इस सिधान्त में अलबर्ट आइन्स्टाइन ने इस बात पर बल दिया कि एकसमान चलने वाली सभी गतिशील पिंडो पर प्रक्रति के नियम समान हैं ! अलबर्ट आइन्स्टाइन इसे विद्युत-चुम्बकीय(electro-magnetic) क्षेत्र की तरह एक क्षेत्र समझते थे ! इस सिधांत ने एक नई परिकल्पना को जन्म दिया जोकि गुरुत्वीय लेंसींग(gravitational lensing) नाम से प्रसिद्ध हैं ! यह इस प्रकार था ;”यदि एक प्रकाश -किरण गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में से गुज़रे तो वह मुड़ जायेगी ! इसका मतलब यह हुआ कि प्रकाश सरल रेखाओं में नही बल्कि वक्र रेखाओं में गमन करता हैं ,जोकि न्यूटन के सिधांत के विपरीत हैं ! उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इस तथ्य का परीक्षण तारों के प्रकाश का ,सूर्य के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में,परीक्षण किया जा सकता हैं । दिन में सूर्य की तेज़ रोशनी के कारण तारे दिखाई नही देते हैं लेकिन सूर्यग्रहण (जब सूर्य ,चन्द्रमा और पृथ्वी एक सीध में आ जाते हैं और सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थित चाँद की परछाई पृथ्वी पर पड़ती हैं । पृथ्वी के जो इलाके इस साए की चपेट में आ जाते है वहाँ सूर्य का कुछ हिस्सा कुछ समय के लिए दिखाई नही देती हैं । पूर्ण-सूर्यग्रहण की अवस्था में अन्धकार छ। जाता हैं ,दिन में रात हो जाता हैं ,दिन में तारे दिखाई देने लगते हैं ।) के समय तारे और सूर्य दिखाई नही देते हैं ,जैसाकि हम जानते हैं । आइन्स्टाइन ने कहा था कि उनके सिधांत का परीक्षण किया जा सकता हैं । यद्यपि इसके लिए उन्होंने जो तर्क दिया था वह उस समय पर्याप्त रूप से पुष्ट प्रतीत नही होता था । यही नही यह बहुत अजीब भी लगता हैं ।
दुनिया के वैज्ञानिको ने इस सिधांत (गुरुत्वीय लेंसींग )पर ध्यान दिया अंततः यह सिधांत पूर्णतया साबित भी हुआ !
अलबर्ट आइन्स्टाइन ने सामान्य सापेक्षतावाद(Theory of General Relativity) के सिद्धांत का विकास किया और उसे 1916 में ”ईयर बुक ऑफ़ फिजिक्स ”में प्रकाशित किया । इस सिधांत की रुपरेखा भी यहाँ नही दी जा सकती ! इसमें आइन्स्टाइन के गुरुत्वाकर्षण का नया सिधांत था ! इससे न्यूटन की अचर समय और अंतरिक्ष की संकल्पनाए खत्म हो गयी ! आइन्स्टाइन इस ब्रह्मांड को चार-विमाओ (चतुर्विम )से युक्त मानते थे जिसमे चौथा विमा समय था !
उनके अनुसार ब्रह्मांड का आकार इसमें मौजूद वस्तुओं के गुरुत्वाकर्षण से समझा जा सकता हैं उनके अनुसार इसके बिना ब्रह्मांड का अस्तित्व सम्भव नही हैं ! उन्होंने स्थिर ब्रह्मांड की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि ;-भौतिक वस्तुओं के कारण ही ब्रह्मांड गोलाकार और सिमित हैं ,लेकिन आइन्स्टाइन का यह तर्क पूर्णतया गलत था आज अनेको तथ्य यह इंगित करते हैं कि ब्रह्मांड फ़ैल (expand ) रहा हैं ! आकाशगंगाओ के बीच दूरियां ठीक उसी तरह बढ़ रही हैं जैसा कि आप जन्म-दिन में घर को सजाने के लिए रंग-बिरंगे बिंदियुक्त गुब्बारे को फुलाते वक्त बिंदियो के बीच की दूरी को बढ़ते देखते हैं !
आइन्स्टाइन ने कहा ,गुरुत्वाकर्षण को सापेक्षता-सिधांत से सम्बन्धित करने का काम आशा से ज्यादा कठिन हैं क्योंकि यह यूक्लिड के ज्यामिति(हम जो ज्योमेट्री पढ़ते हैं ) से मेल नही खाता हैं ! यही कारण हैं यह समझने में कठिन भी प्रतीत होता हैं ! हम यूक्लीडियन ज्योमेट्री को सही मानते हैं ! यह पृथ्वी पर हमारे अनुभवों के आधार पर सही लगता हैं ,परन्तु अंतरिक्ष (ब्रह्मांड )में यह बिलकुल भी सही नही हैं ! आइन्स्टाइन के इस नये सिधांत ने भौतिक-शास्त्र के उस समस्या का हल कर दिया जिसके लिए वैज्ञानिक बहुत समय से भ्रमित थे । समस्या कुछ इस प्रकार थी -बुध ग्रह न्यूटन के नियमो के अनुसार नही चल रहा था ! उसमे अंतर केवल थोड़ा था लेकिन वह सुनिश्चित था ! इस विचलन न्यूटन के सिधान्तो के अनुसार नही समझा जा सकता था ! लेकिन आइन्स्टाइन के अनुसार इसका उत्तर यह था कि बुध ग्रह सूरज के नजदीक था इसलियें इस पर सूर्य के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का बहुत प्रभाव था ! आइन्स्टाइन ने बुध ग्रह की गति की गणना की और पता लगाया कि उसकी गति जैसी होने चाहिए वैसी ही थी । साधारण सापेक्षताके सिद्धांत के अनुसार हर शताब्दी में 43 सेकण्ड का विचलन होना चाहीये , और यह विचलन निरिक्षणों के अनुरूप था। यह प्रभाव काफ़ी छोटा है लेकिन गणना के अनुसार और सटीक है ।
इससे आइन्स्टाइन प्रसिद्ध हुए !विज्ञान न जानने वाले भी उनकी बहुत प्रशंसा करते थे !

 

 

 

 

 

आइन्स्टाइन,अंतरिक्ष और सापेक्षता भाग-2


by-प्रदीप कुमार 

अंतरिक्ष और समय (Space and Time )
एक गतिशील यंत्र में लगा एक मापक-दंड जिस दिशा में गति होती हैं ,उस तरफ कुछ सिकुड़ता हैं ! किसी भी गतिशील यन्त्र में लगी हुई घड़ी स्थिर अवस्था की तुलना में धीरे चलती हैं ! इसका मतलब यह हैं कि गति जितनी ज्यादा होगी मापक -दंड उतना ही ज्यादा सिकुड़ेगा ! यदि आप यह सोंच रहे हो कि घड़ी प्रकाश की गति से चले तो मापक-दंड इतना ज्यादा सिकुड़ेगा की हमारी घड़ी बंद ही हो जायेगी ! लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि कोई भी वस्तु प्रकाश की गति से नही चल सकती (सापेक्षता के सिधांत के अनुसार ) !
मेरे ख्याल से अबतक ऐसे परिवर्तनों को नापने के लिये पर्याप्त गति से चलने वाले मापक-दण्डो और घड़ियो को नही बनाया गया हैं ,लेकिन आइन्स्टाइन के घड़ी से समन्धित तर्क का सत्यापन हाइड्रोजन मॉलिक्यूलस से किये गये प्रयोग से समझा जा सकता हैं ! आइन्स्टाइन ने बताया कि एक विकिरणयुक्त अणु को घड़ी समझा जा सकता हैं क्योंकि इसमें से निश्चित विद्युत-चुम्बकीय(electro-magnetic) तरंगे निकलती हैं ! इन तरंगो को स्पेक्ट्रोस्कोप से नापकर यह प्रयोग किया गया था !
आइन्स्टाइन के सिधान्तो ने हमे यह भी बताया कि मनुष्य का हृदय भी एक घड़ी की तरह ही हैं और हृदय की धड़कन भी वैसे ही गति द्वारा कम हो जाती हैं ,जैसे अन्य क्रियात्मक प्रक्रियाओ की गति कम हो जाती हैं ! लेकिन इस कमी का आभास गतिशील व्यक्ति को नही होता हैं क्योंकि उसकी घड़ी भी धीमी हो जाएगी इसलिए उसके अपनी नब्ज़ की धड़कन कम या सामान्य महसूस होती हैं ! लेकिन फ्यूचर के अंतरिक्ष-यानो में यह कमी बहुत अधिक होती हैं ।
यदि आप पृथ्वी की घड़ियो के मुताबिक 50 साल की अंतरिक्ष-यात्रा पर जाये और इतनी फ़ास्ट स्पीड (तेज़ गति से ) से यात्रा करे कि अंतरिक्ष-यान के घड़ियो के अनुसार केवल एक महिना लगे तो जब आप अंतरिक्ष यात्रा से वापस लौटकर आओगे तब आप एक महीना ही ज्यादा बड़े लगेंगे । लेकिन पृथ्वी के लोग 50 साल बड़े हो जायेंगे । कल्पना कीजिये कि स्पेस-ट्रेवल पर जाते वक्त आप 30 साल के हो और आप छोटा बच्चा छोड़कर जायें तो लौटने पर सापेक्षता-सिधांत के मुताबिक आपका पुत्र (बच्चा ) आपसे उम्र में 20 साल बड़ा होगा । यह बात हमे बहुत अजीब लगता हैं क्योंकि यह सामान्य -बुद्धि के विपरीत हैं ।
सापेक्षता-सिधांत कि जब भी प्रयोगिक-रूप से जाँच हुई हैं ,वे पूरी तरह से सही साबित हुई हैं ! द्रव्य और उर्जा समीकरण का प्रमाण इनका सबसे मशहूर उदाहरण हैं !
किसी भी पिंड की गति में त्वरण के लिए जरुरी बल की मात्रा को द्रव्यमान (mass)कहते हैं ! भौतिकी मे द्रव्यमान ऊर्जा से जुडा हुआ है। किसी पिंड का द्रव्यमान गतिशिल निरीक्षक के सापेक्ष उस पिंड की गति पर निर्भर करता है। गतिशिल पिंड यदि अपने द्रव्यमान की गणना करता है तब द्रव्यमान हमेशा समान ही रहेगा। लेकिन यदि निरिक्षक गतिशिल नही है और वह गतिशिल पिंड के द्रव्यमान की गणना करता है, तब निरिक्षक पिंड की गति के त्वरित होने पर उस पिंड के द्रव्यमान मे वृद्धि पायेगा। सरल शब्दो मे आप एक जगह खडे होकर किसी गतिशिल पिंड के द्रव्यमान की गणना कर रहे हों और वह पिंड अपनी गति बढाते जा रहा हो तो आप हर मापन मे उस पिंड के द्रव्यमान को पहले से ज्यादा पायेंगे। इसे ही सापेक्ष द्रव्यमान (relativistic mass)कहते है। ध्यान दिजीये कि आधुनिक भौतिकी मे द्रव्यमान के सिद्धांत का प्रयोग नहीं होता है, अब उसे ऊर्जा के रूप मे ही मापा जाता है। अब ऊर्जा और द्रव्यमान को एक ही माना जाता है। जोकि उर्जा-द्रव्यमान समीकरण के नाम से प्रसिद्ध हैं -E = mc² उन्होंने इस सिधांत को कुछ इस तरह साबित किया -कि प्रत्येक कण में उर्जा ,द्रव्य और प्रकाश की गति के वर्ग के गुणफल के बराबर होता हैं । प्रकाश की गति (निर्वात में ) 30000000000 cm/sec. हैं इसलिए एक ग्राम पदार्थ में लगभग 900000000000000000 जूल उर्जा पैदा होगी !
सुरुवात में यह सिधांत भी सामान्य-बुद्धि के विपरीत लगा लेकिन जब परमाणु बम बना तो यह समीकरण बिलकुल सत्य सिद्ध हुआ !
आगे के लेखो में सापेक्षता के सिधान्तो को विस्तार में देखेंगे !

आइन्स्टाइन,अंतरिक्ष और सापेक्षता भाग-1


आइन्स्टाइन के सिधांत (सापेक्षता ) को आइन्स्टाइन से भी अधिक सरल भाषा में समझाना मुझे असंभव प्रतीत होता (लगता )हैं ! आइन्स्टाइन के सिधान्तो को समझने में दो सबसे बड़ी कठिनाईया हैं ! पहली कठिनाई यह हैं कि इसके लिये गणित और भौतिक -विज्ञान के पर्याप्त ज्ञान की जरुरत हैं ! दूसरी कठिनाई यह हैं की यह सिधांत हमारे सामान्य -बुद्धि से मेल नही खाती हैं ! यह दूसरी कठिनाई मानव के विश्व के बारे में ज्ञान -बाधक रही हैं । सोलहवी सदी में लोग इस बात को सही मानते थे कि पृथ्वी एक गोलाकार खगोलीय पिंड हैं तथा सूर्य तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं ,क्योंकि उनके ज्ञान के अनुसार पृथ्वी बिलकुल भी नही घूमती थी और पृथ्वी सपाट थी । एक शताब्दी बाद न्यूटन के सिधान्त के विषय में ऐसा ही समझा जाता था ,लेकिन आज हम जानते हैं कि न्यूटन के सिधान्त आइन्स्टाइन के सिधान्तो की अपेक्षा आसानी से समझा जा सकता हैं ।
आइन्स्टाइन का सापेक्षता-समन्धि शोध
1901 से आइन्स्टाइन ने हर साल एक लेख जर्मन पत्रिका ईयर बुक ऑफ़ फिजिक्स में लिखा ! 1905 में जब वे 26 साल के थे ,उन्होंने पांच शोध-पत्र प्रकाशित किये ! उनमे से एक शोध बहुत लम्बा था ! उस शोध का नाम था -ऑन दी इलेक्ट्रो-डायनोमिक्स ऑफ़ बॉडीज इन मोशन ! imagesयही वह शोध पत्र हैं,जिसने मानव की संकल्पना ही बदल दी ,वास्तव में यह सापेक्षता के विशेष सिधांत  (Theory of Special Relativity ) का ही विवरण था !
जुरिख में आइन्स्टाइन ने जो कुछ पढ़ा था ,वह सब न्यूटन के दो सौ साल पुराने नियमो और सिधान्तो पर आधारित था ! विश्व समन्धि न्यूटन के कल्पना को यान्त्रिक कहा गया था क्योंकि न्यूटन के बाद लगभग सभी वैज्ञानिक भौतिक घटनाओं को मशीन के रूप में समझते थे ! न्यूटन के नियम दो कल्पनायों थी : समय और अंतरिक्ष अचर(Variable ) हैं ! वे अंतरिक्ष को स्थिर मानते थे । वे अंतरिक्ष को ही सभी गतिशील वस्तुओं को समझने की जगह मानते थे । उन्नसवी सदी में कुछ वैज्ञानिको ने अनुभव किया कि कुछ वस्तुवे ,घटनाएँ ऐसी हैं जो इन नियमो से ताल-मेल नही बना पाता हैं । लेकिन फिर भी उस समय सैधांतिक रूप में न्यूटन के नियमो का विरोध नही किया जा सकता था ।
न्यूटन के कारपसकुलर अवधारणा(corpuscular hypothesis) के अनुसार प्रकाश छोटे छोटे कणों (जिन्हें न्यूटन ने कारपसकल नाम दिया था।) से बना होता है। न्युटन का यह मानना प्रकाश के परावर्तन(reflection) के कारण था क्योंकि प्रकाश एक सरल रेखा मे परावर्तित होता है और यह प्रकाश के छोटे कणों से बने होने पर ही संभव है। केवल कण ही एक सरल रेखा मे गति कर सकते है। लेकिन उसी समय क्रिस्चियन हायजेन्स( Christian Huygens) और थामस यंग( Thomas Young) के अनुसार प्रकाश में ,ध्वनि की तरह तरंगे होती थी । जिस तरह ध्वनि-तरंगे हवा की मदद से चलती हैं उसी प्रकार प्रकाश -तरंगो के लिये भी किसी माध्यम की जरुरत थी । क्योंकि प्रकाश दूर स्थिर तारों से पृथ्वी तक पहुँचने के लिए शुन्य से होकर गुजरता था । इसलिए यह सुझाव दिया गया कि प्रकाश ऐसे माध्यम से होकर आता था जो कि सारे अंतरिक्ष में मौजूद था इस माध्यम को ईथर कहा जाता था । यह सिधान्त तब साबित हुआ जब जेम्स मैक्सवेल ने प्रकाश -तरंगो को विद्युत-चुंबकिय दोलनो के रूप में साबित किया ।
जब आइन्स्टाइन सोलह साल के थे तो उन्होंने ईथर समन्धि सिधान्त में एक विरोधाभास देखा । उन्होंने तर्क दिया ,”यदि मैं प्रकाश की गति से एक प्रकाश किरण का पीछा करूँ तो वह प्रकाश किरण एक स्थिर आकाशीय दोलक विद्युत-चुम्बकीय(electro-magnetic) क्षेत्र की की तरह दिखाई देनी चाहिये ! लेकिन मैक्सवेल के सिधांत अनुसार ऐसा होता नही प्रतीत होता ! दरअसल यह सापेक्षता के विशेष सिधान्त (Theory of Special Relativity ) की शुरुवात थी !
१८८१ में ए.ए माइकलसन और डव्लू.मोरले नमक दो वैज्ञानिको ने ईथर से पृथ्वी की सापेक्ष-गति मालूम करने का प्रयास किया । इन दोनों वैज्ञानिको ने मिलकर इंटरफेरोमीटर नामक एक मशीन बनाया ,जिसकी मदद से प्रकाश को पैमाना मानकर यह प्रयोग किया जा सकता था ! उस प्रयोग के निष्कर्स काफी अजीब थे ! इसके मुताबिक पृथ्वी की ईथर की गति शून्य थी ! इसका मतलब यह था की या तो पृथ्वी गतिहीन थी या ईथर से समन्धि सिधांत गलत था ! इन प्रयोगों पर विचार करते हुए आइन्स्टाइन ने ईथर-सिधांत को अस्वीकृत कर दिया !उन्होंने यह धारणा दी कि सभी प्रयोग (प्रकाश से समन्धि ) प्रयोगों के एक से परिणाम होंगे ,चाहे किसी भी प्रयोगशाला में हो ,चाहे प्रयोगशाला गतिशील हो या स्थिर हो ! क्योंकि प्रकाश की गति निश्चित(निरपेक्ष) हैं ! बाद में उन्होंने एक सामान्य सिधांत दिया कि एकसमान चलने वाली सभी गतिशील पिंडो पर प्रकृति के नियम समान हैं ! प्रकाश की गति प्रकाश के स्त्रोत पर निर्भर नही हैं -इसका मतलब यह हुआ कि (न्यूटन के अनुसार ) निरपेक्ष गति को मालूम करने का कोई तरीका नही हो सकता ! ग्रहों की गति एक-दूसरे के सापेक्ष ही कही जा सकती हैं !आइन्स्टाइन ने निरपेक्ष समय की अवधारणा को भी अस्वीकार कर दिया ! उनका तर्क यह था की सभी प्रेक्षको का अपना ‘अब’ होता हैं ! समय निरपेक्ष (Absolute ) हैं जिस समय प्रेक्षक ‘अब’ कहता हैं वह सारे ब्रह्मांड के लिए लागू नही होता हैं ! एक ही ग्रह पर स्थित दो प्रेक्षक(Observer ) घड़ी मिलाकर या संकेत द्वारा अपनी निर्देश-पद्धति में समानता ल सकते हैं ,लेकिन यह बात उनके सापेक्ष एक गतिशील प्रेक्षक के विषय में लागू नही हो सकती !

जब आइन्स्टाइन 16 साल के थे ,उनके पास एक और समस्या थी की यदि वे प्रकाश किरण को प्रकाश की ही गति से पीछा करे तो प्रकाश किरण उन्हें कैसी दिखाई देगी ? सापेक्षता के सिधांत के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर यह था कि वे प्रकाश की गति से चल ही नही सकते थे ! इस सिधांत के अनुसार भौतिक बस्तुओ की गति प्रकाश की गति के लगभग बराबर भी हो सकती हैं ! प्रश्न यह उठता है कि यदि कोई प्रेक्षक प्रकाश की गति से चल रहा हो तो क्या प्रकाश उसके उपकरणों तक उसी गति से पहुंचेगा जिस गति से स्थिर अवस्था में पहुंचता हैं ? सापेक्षता के सिधांत के अनुसार ऐसा होना चाहिए ;इसे साबित करने के लिए आइन्स्टाइन ने गतिशील पैमाने और घड़ी के कुछ विशेषताओ की ओर संकेत किया !….अगले भाग में क्रमश:
संदर्भ ग्रन्थ (दोनों भागो में उपर्युक्त)
1)-Great discovers in modern science by petrick pringle
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स्थिर ब्रह्माण्ड की अवधारणा (The concept of static universe)


सूर्य हमसे चौदह करोड़ अट्ठासी लाख किलोमीटर दूर हैं तथा सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग आठ मिनट अट्ठारह सेकंड लगते हैं ! इस तथ्य से हम आसानी से ब्रह्माण्ड की व्यापकता का अनुमान लगा सकते हैं ! हमार ब्रह्माण्ड में लगभग एक अरब आकाशगंगाये हैं ,तो यहाँ यह प्रश्न उठना यह स्वाभाविक हैं कि यह ब्रह्माण्ड स्थिर हैं या गतिशील हैं ?२०वी तथा २१वीं सदी में खगोल विज्ञान ने बहुत प्रगति की हैं और ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया हैं !
स्थिर ब्रह्माण्ड

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यदि आकाश में में न तो फैलाव हो रहा हो न तो कोई संकुचन हो रहा हो तो आकाश को स्थिर मान सकते हैं और यह पुरे ब्रह्माण्ड के लिए सत्य हैं ! न्यूटन ने आकाश में दिखने वाले तारोँ की स्थिति में कोई अंतर न पाकर स्थिर ब्रह्माण्ड की अवधारणा का जन्म दिया और तर्क दिया कि आकाशीय पिंडो को गुरुत्वाकर्षण के बिरुद्ध नेगिटिव मास काम करता हैं ! न्यूटन ने आकाश को अनन्त तारो और आकाशिय पिंडो से भरा अनन्त आकाश (ब्रह्माण्ड ) माना लेकिन तारों के अपने स्थान पर बने रहने का कारण खोज नही पाए !
पहले आइंस्टीन का भी मत था कि ब्रह्माण्ड स्थिर और सीमित हैं । सापेक्षता के अपने ही सिधान्त में स्थिर ब्रह्माण्ड से समन्धित कोई संकेत न मिलने के बावजूद स्थिर ब्रह्माण्ड की अवधारणा को बिलकुल सत्य माना । उन्होंने यह साबित करने के लिए की ब्रह्माण्ड स्थिर है ,अपने खुद के समीकरणों को संशोधित कर दिया । विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रेड होयल व भारतीय वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर ने ब्रह्माण्ड की अवधारणायो पर गहन अध्ययन कर अपने अलग मत (सिधान्त )दिए ।उनके अनुसार ब्रह्माण्ड के जन्म या अंत होने वाले सिधान्तो को सही नही माना । उनके अनुसार आकाश का किसी भी दिशा में ,किसी भी समय ,कहीं से भी देखने में सदा एक ही जैसा दिखता हैं । परन्तु उर्जा संरक्षण की समस्या का समाधान न मिलने की वजह से यह सिधान्त अत्याधिक मान्य नही हो सका ।
फैलता ब्रह्माण्ड

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स्थिर ब्रह्माण्ड के विरुद्ध पहली बार खुलकर अलक्जेंडर फ्रीडमान ने यह मत रखा की ब्रह्माण्ड गतिशील हैं ,और इसके पीछे यह तर्क दिया कि ब्रह्माण्ड का स्थिर रह पाना असम्भव हैं । जैसा की हम पहले बता चुके हैं कि आइंस्टीन का उर्जा समीकरण (E=mc2 ) ब्रह्माण्ड के स्थिर होने का कोई संकेत या तर्क नही देता । आइंस्टीन भी फ्रीडमान से कुछ समय तक सहमत नही रहे । एडविन पी हब्बल ने यह निष्कर्स निकाला(वर्ष 1925 ई .में ) कि हमारी आकाशगंगा(milky way) की तरह करोड़ो आकाशगंगाए मौजूद हैं । उन्होंने यह प्रमाणित किया कि सभी आकाशगंगाये एक दुसरे से दूर होती जा रही हैं ,उनके एक दूसरे से दूर जाने की गति उनके मध्य के अंतर में अनुपात हैं । जैसे-जैसे उनकी दूरी बढती जाती हैं ,उनके भागने की गति और तेज़ हो जाती हैं । इसे आकाशगंगा के प्रतिसरण (the law of recession of galxies) कहते हैं ।
आज हमारे पास अनेक तथ्य ऐसे हैं जो हमे बताते हैं की हमारा ब्रह्मांड वास्तव में फ़ैल रहा है यानि विस्तार कर रहा है । यह फैलाव लगभग 15 अरब साल पहले बिग-बैंग के समय से हो रहा हैं ।ब्रह्माण्ड का यह फैलाव उसे कहाँ तक ले जायेगा कोई भी नही जानता । हाँ,अब तक इस से समन्धित दो सिधान्त सामने आये हैं । पहला सिधान्त तो यह हो सकती हैं कि यह विश्व करोडो सालो तक फैलती और सिकुड़ती रहेगी और इसके बाद गुरुत्वाकर्षण इनके विस्तार की गति को रोक देगा ! इसके बाद यह सिकुड़ना शुरु हो जायेगा यानि अपने अन्दर ही सिमट जायेगा ,और शायद आकाश -गंगाए ब्लैक होल में परवर्तित हो जाएँगी । दूसरे सिधान्त का अनुसार (जो कि सर्वाधिक मान्य सिधान्त हैं । ) ब्रह्माण्ड निरंतर फैलता रहेगा ,और ऐसा ही रहेगा ।

by –pradeep kumar

 

 

नासा लांच करेगा उड़न तश्तरी


by-pradeep kumar
140612144203_ufo_624x351_alamy उड़न तश्तरी
अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा एक ऐसा अंतरिक्ष यान लांच करने जा रही है जो देखने में एकदम उड़न तश्तरी की तरह दिखता है(चित्र 1 ).

क़रीब आधी से अधिक शताब्दी से ये विशिष्ट आकार लोगों की सबसे लोकप्रिय कल्पनाओं में शामिल रहा है! नासा उड़न तश्तरी के आकार के लो-डेंसिटी सुपरसोनिक डेसिलेरेटर (एलडीएसडी) के परीक्षण की तैयारी कर रहा है! अंतरिक्ष एजेंसी को उम्मीद है कि एक दिन ये यान मंगल ग्रह पर लैंड करेगा! उड़न तश्तरी के आकार के यानों को ‘फॉरबिडेन प्लैनेट’ और ‘द डे दि अर्थ स्टुड स्टिल’ जैसी साइंस फिक्शन फ़िल्मों में दिखाया जा चुका हैं ! अब उड़न तश्तरी लोगों के दिलोदिमाग पर छाई हुई है और अब ये एक ‘आइकन’ बन गई है!

सबकी पसंद
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उड़न तश्तरी
जबसे यूएफ़ओ (उड़ती हुई अनजान चीज) विशेषज्ञों ने इस तरह की आकृति की तस्दीक की है, तबसे डिजाइनरों ने इस आकृति को पूरी तरह अपना लिया है! ब्राजील के समकालीन कला संग्रहालय से लेकर फ़ोन और केतली जैसे घरेलू उपकरणों को इस आकृति में ढाला गया !

नॉर्थम्प्टन विश्वविद्यालय में साइंस फैंटेसी और पापुलर कल्चर के विशेषज्ञ माइकल स्टार कहते हैं, “ये एक यूनीवर्सल रूपक बन गया है!”

नासा यूएफओ
वैसे तो डिस्क के आकार की चीजें आसमान में हमेशा से दिखती रही हैं, लेकिन उड़न तश्तरी को आम लोगों के बीच उस समय मान्यता मिली जब 24 जून, 1947 को पायलट केनेथ ऑर्नोल्ड ने बताया कि उन्होंने वाशिंगटन प्रांत में माउंट रैनियर के पास नौ चमकीले यूएफ़ओ देखे!

ऑर्नोल्ड ने बताया कि ये यूएफ़ओ तश्तरी के आकार के थे. इस ख़बर को अख़बारों में काफ़ी जगह मिली और जल्दी ही समाचार पत्रों ने “उड़न तश्तरी” शब्द को गढ़ लिया! इस घटना के बाद  ही रॉसवैल और न्यू मैक्सिको सहित कई स्थानों पर इस तरह के यान दिखाई देने की ख़बरें आईं !

माइकल स्टार बताते हैं कि इस तरह की उड़न तश्तरियां पश्चिमी लोगों की कल्पना में आने की एक वजह ये थी कि उन्हें अपने कम्युनिस्ट शत्रुओं से हमले का ख़तरा था!

व्यावहारिकता
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उड़न तश्तरी
स्विटज़रलैंड के मनोचिकित्सक कार्ल जुंग उड़न तश्तरियों के आकार को बौद्ध और हिंदू धर्म के धार्मिक चिन्ह ‘मंडल’ से प्रेरित बताते हैं.

स्टार बताते हैं कि पचास के दशक में साइंस फिक्शन में इस आकार को अपनाने की एक प्रमुख वजह ये रही थी इसका फ़िल्मांकन करना बेहद आसान था! स्टार बताते हैं, “आपको बस एक प्लेट और एक डोरी की ज़रूरत है. व्यावहारिक नज़रिए से ये कमाल का है.”

शेफ़ील्ड हैलम यूनिवर्सिटी के डेविड क्लार्क ने अपने जीवन के तीन दशक यूएफ़ओ के अध्ययन में बिताए हैं. क्लार्क बताते हैं, “या तो एलियंस ने अपने विमान के लिए एक ऐसा डिज़ाइन तैयार किया जो हमारी दुनिया की फ़िल्मों के लिहाज़ से फ़िट था या फिर कुछ और ही चल रहा था !”

नासा यूएफओ
लेकिन डिस्क के आकार की उड़न तश्तरियों को दुनिया भर की सरकारों और सेना ने कोरी कल्पना नहीं माना!उदाहरण के लिए जर्मनी के इंजीनियर जॉर्ज क्लेन ने सीआईए को बताया कि उन्होंने एक नाज़ी उड़न तश्तरी के लिए काम किया ! सैद्धान्तिक रूप से ये आकार एयरोडायनमिक्स के लिहाज़ से सटीक है. अंतरिक्ष वैज्ञानिक मैगी एडरिन पोकोक ने बताया, “अगर ये हॉरिज़ॉटली हवा के साथ चल रहा है तो बहुत अधिक वायु प्रतिरोध नहीं होना चाहिए.” समस्या सिर्फ संचालन प्रणाली को लेकर है! ऐसे में नासा के इंजीनियरों को उम्मीद है कि एलडीएसडी का परीक्षण सफल होगा!

साभार :बीबीसी न्यूज़ मैगज़ीन

बर्फ से आग जलाना !


क्या आप जानते है ,कि बर्फ की मदद से आग सुलगाया जा सकता है ? क्या आप जानते है ?,कि बर्फ की मदद से उत्तल लेंस (convex lens)बनाया जा सकता है और इसलिए आप बर्फ से भी आग सुलगा सकते है । लेकिन एक शर्त है ,शर्त यही है कि वह पर्याप्त पारदर्शी(जिसके आर-पार देखा जा सकता हो ) हो । और इसके लिए हम सौर-किरणों की मदद लेते है । आप सोंच रहे होंगे कि ऐसे तो बर्फ को धूप में लाने से पिघल जाएगी ,लेकिन बर्फ धूप में पिघलेगी नही ,क्योंकि किरणों को अपवर्तित करने से वह गर्म नही होती । जैसा की हम जानते है कि पानी और बर्फ के परावर्तन(reflection) में ज्यादा अंतर नही है ।
बर्फ का लेंस अच्छा काम आया था जूल वेर्न द्वारा लिखित “कैप्टेन हेटारस की यात्रा ” में । माचिस खो चुका था और भयानक ठण्ड में कही से आग जलाने की गुंजाइश नही थी । सोंच में पड़े यात्रियों को इस स्थिति से मुक्ति दिलायी डॉ० क्लाबोनी ने :-
-यह दुर्भाग्य की बात है ,हेटरास ने कहा
-हाँ ,-डॉक्टर ने उत्तर दिया ।
-हमारे पास दूरबीन भी नही है कि उसका लेंस निकालकर आग जलाये ।
-जानता हूँ ,-डॉक्टर ने कहा ,-और बहुत अफ़सोस की बात है । यहाँ सूरज कितना तेज़ चमक रहा है सूखी घास बहुत जल्द सुलग जाता ।
फिर डॉक्टर ने सोंचते हुए कहा –मेरे मन में एक विचार आया है ! हम लेंस बना सकते है !
हेटरास ने पूछा -कैसे ?
-बर्फ के टुकड़े से ,डॉक्टर ने कहा
-क्या आप सचमुच सोंच रहे हैं की …. हेटरास ने कहा
डॉक्टर-और नही तो क्या ! आखिर सूर्य-किरणों को एक बिंदु पर जमा ही तो करना है ,और इसकेलिए बर्फ अच्छे-से –अच्छा लेंस की बराबरी कर सकता है । लेकिन मै मीठे पानी से जमे बर्फ को अधिक पसंद करूंगा ,क्योंकि यह अधिक कड़ा और पारदर्शी होता है । एक जगह की ओर इशारा करते हुए बोले –यदि मै गलत नही हु ,तो मुझे इसी की जरुरत है । बर्फ के उस टीले का रंग देखिये “वह मीठे पानी से जमा है ।
दोनों मिलकर उस टीले की ओर चल पड़े । बर्फ सचमुच मीठे पानी का था ।
डॉक्टर ने करीब एक फीट व्यास वाले बर्फ के टुकड़े को काटने के लिये कहा । इसके बाद उसने उसे समतल सा किया फिर चाकू से काट-छाट की ,लेंस के आकार में तराशा और हाथ से रगड़ -2 कर उसे चिकना कर लिया । लेंस तैयार था और अच्छे से अच्छे लेंस से टक्कर ले सकता था । सूरज बहुत तेज़ी से चमक रहा था । डॉक्टर ने लेंस को किरणों के रास्ते (पथ ) में रखा और सूखी घास पर उन्हें केन्द्रित किया । घास कुछ ही समय में जल उठी ।
जूल वेर्न का यह किस्सा काल्पनिक है ,लेकिन यह इतना भी काल्पनिक नही है :बर्फ के लेंस से आग जलाने का प्रयोग पहली बार इंगलैंड में किया गया था । 1763 ई. में वहाँ बर्फ के काफी बड़े लेंस से एक पेड़ में आग लगायी गयी थी । तब से यह प्रयोग कई बार सफलतापूर्वक दुहराया जा चुका है । यह बात दूसरी है कि बर्फ का पारदर्शी लेंस चाकू और खाली हाथ(भयानक ठण्ड में) जैसे औजारो से बनाना कठिन है । पर बर्फ का लेंस बनाने के लिए आसान तरीका भी है :चित्र के अनुरूप कटोरी में पानी डाल कर फ्रीज़ में जमा लीजिये और फिर बर्तन को हल्का सा गर्म करके तैयार लेंस निकाल लीजिये ।बर्फ बनाने के लिए कटोरी
सूर्य-किरणों से सहायता
ऐसे लेंस का प्रयोग करते वक्त यह न भूले कि खिड़की के दर्पण से आने वाली धूप में आप कुछ नही जला पायेंगे । दर्पण सूर्य-किरणों की ऊर्जा को काफी बड़ी मात्रा में सोख लेता है और बची-खुची ऊर्जा इतनी ज्यादा नही होती कि किसी चीज़ को जलाने लायक गर्मी दे सके । बेहतर है खुले स्थान पर किसी ऐसे जगह पर प्रयोग करे ,जहाँ का वातावरण का तापमान जीरो से नीचें हो ।
एक और प्रयोग करे ,जो सर्दियों में आसानी से किया जा सकता है । धूप में घर के बाहर एक बर्फ का बड़ा टुकड़ा रख दे । बाहर पड़ी बर्फ पर एक नाप के दो कपड़े के टुकड़े –एक काला और एक सफ़ेद –रख दे । एक घंटे बाद आप देखेंगे की काला कपड़ा बर्फ में कुछ नीचे धंस गया है ,पर सफ़ेद उसी ऊँचाई पर है । कारण ज्यादा कठिन नही है :काले कपड़े के नीचे बर्फ जल्द पिघलता है ,क्योंकि काले धागे सूर्य-किरणों के बहुत बड़े भाग को सोख लेता है । सफ़ेद कपड़ा उल्टा उसे (प्रकाश को ) छितरा देता है और इसलिये काले कपड़े की तुलना में बहुत कम गर्म होता है । यह प्रयोग सबसे पहले संयुक्तराष्ट्र के वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रेंकलिन ने किया था । उनका नाम तड़ित-चालक के लिए प्रसिद्ध है । वे अपने प्रयोग का वर्णन इस प्रकार करते है :”एक बार मै दर्जी की दूकान से कपड़ो के कई टुकड़े ले आया । हर टुकड़े का रंग अलग-2 था –काला,नीला,हल्का नीला,हरा,गुलाबी ,सफेद । और भी कई दूसरे रंग थे । एक दिन जब अच्छी धूप उगी हुई थी,मैंने इन टुकड़ो को बाहर बर्फ बिछा दिया । काला कपड़ा कुछ ही घंटो बाद इतना गर्म हो गया कि बिलकुल ही बर्फ में धँस गया । सूर्य की किरण अब उस उस तक नही पहुँच रही थी । नीला कपड़ा भी उतना ही धँसा हुआ था , जितना काला । हल्का नीला काफी कम धँसा हुआ था अन्य रंग के कपड़े उतना ही कम धंसे थे ! सफ़ेद कपड़ा तो बिलकुल नही धँसा नही था । “
यह सिधान्त बेकार होता ,यदि उससे कोई निष्कर्स नही निकाला जा सकता –आगे वे कहते है ।-क्या हमे इस प्रयोग से यह नही पता चलता की गर्म जलवायु वाले देश में ,जहाँ सूरज काफी तेज चमकता है ,सफ़ेद की तुलना में काला कपड़ा अधिक गर्मी देता है ,अत: कम फायदेमंद है । यदि हमारे शरीर की उन गतियो पर ध्यान दिया जाये ,जो शरीर को खुद-ब-खुद गर्मी देते है ,तो काला कपड़ा और भी बेकार है वह शरीर को अतिरिक्त गर्मी देता है । क्या वहाँ स्त्री-पुरुषो की टोपिया सफ़ेद नही होनी चाहिये,जो लू लगाने वाली गर्मी से बचाव करती है ? क्या ध्यान से प्रयोग करने वाला व्यक्ति अनेक दूसरी छोटी-बड़ी बातो से दूसरे प्रकार के लाभ नही प्राप्त कर सकता ?
(नोट-इस लेख के कुछ अंश (numerator) ya.perelman के पुस्तक physics for entertainment से लिया गया है !)

कहानी ब्रह्मांड की !


प्रदीपदुनिया कब बनी ?कैसे बनी ?-यह एक लम्बी कहानी है ! यह सब -कुछ जानने के लिए सबसे पहले हमे यह जानना होगा कि ब्रह्माण्ड क्या है ?यह कब बना तथा कैसे बना है ?यह पहले किस स्थिति में रहा होगा ?अब यह कहा और क्यों जा रहा है ?और हमारे ब्रह्माण्ड का भविष्य क्या होगा ?
ब्रह्माण्ड के समन्ध में उपरलिखित प्रश्नों का उत् र पाना सदा से ही कठिन रहा है ,जिस प्रकार कोई यह नहीं कह सकता कि पहले मुर्गी आयी या अंडा ?उसी प्रकार कोई यह नही बता सकता की ब्रह्माण्ड का जन्मदाता कौन है ?प्रस्तुत लेख में इन्ही प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिस की गयी है !
वास्तविकता में ब्रह्मांड के बारे में ऐसे अनेक तथ्य है ,जिनके बारे में विज्ञान को भी बहुत कम जानकारी है !ब्रह्माण्ड के बारे में बहुत कुछ अनुमानों के आधार पर वैज्ञानिको ने अपने मत प्रस्तुत किये है ! रात के समय आकाश की ओर देखे तो दूर-२तक तारे ही तारे दिखाई देते है !दरअसल यही आसमान ब्रह्माण्ड का एक भाग कहा जा सकता है !पूरा ब्रह्माण्ड हमे दिखाई दे ही नही सकता ,इतना असीम की हमारी नज़र उस सम्पूर्ण तक पहुँच ही नही सकती i आकाश में जो तारो के समूह दिखाई देती है ,वे आकाशगंगाए है i
ब्रह्माण्ड कितना विशाल है ,इसकी हम कल्पना भी नही कर सकते ! अरबो-खरबों किलोमीटर चौड़ा मालूम होता है ! ब्रह्मांड की दूरियां इतनी बड़ी होती है कि उन्हें नापने के लिए एक विशेस पैमाना निर्धारित करना पड़ा -लाइट ईयर (light year) ! दरअसल प्रकाश एक सेकेंड में लगभग तीन लाख किलोमीटर की दूरी तय करती है !इसलिए एक लाइट ईयर 94खरब ,60 अरब ,52 करोड़ ,84 लाख ,5हजार किलोमीटर की दूरी तय करेगी !
अब आते है ,ब्रह्माण्ड की सिधान्तो पर -1) सर्वप्रथम 140 ई. में यूनानी खगोलशास्त्री टालेमी ने पूरे विश्व का अध्ययन किया ! और उसने भूकेंद्री सिद्धांत (geocentric theory) दिया ! इस सिद्धांत के अनुसार ,पृथ्वी विश्व के केंद्र में स्थित है और सूरज और बाकि ग्रह इसकी परिक्रमा करते है !
2)सन १५४३ में टालेमी के भूकेंद्री सिद्धांत को गलत सिद्ध किया और सूर्य केंद्री सिद्धांत (heliocentric theory) का प्रतिपादन किया ! इस सिद्धांत के अनुसार ,विश्व के केंद्र में सूरज है न की पृथ्वी और पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है !
3)जोहान्स केप्लर ने सर्वप्रथम ग्रहों के गति के नियम दिए ! जिनके अनुसार ग्रहों के चारो चक्कर लगाने -वाले ग्रहों का पथ अंडाकार (elliptical) है !
महाविस्फोट (big-bang) से हुआ ब्रह्माण्ड का जन्म !
ब्रह्माण्ड की उत्पति कैसे हुई ?इस प्रश्न के उत् र स्वरुप कुछ वैज्ञनिको की अनोखी मान्यता है (यह ब्रह्माण्ड के उत्त्पति का सबसे ज्यादा माना जाने वाला सिद्धांत है ) इस सिद्धांत का प्रतिपादन जार्ज लेमितरे (georges lemitre) नामक एक खगोलशास्त्री ने किया था !इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड एक अकास्मित घटना के कारण अस्तित्व में आया ! सिधान्त के अनुसार ,प्रारम्भिक रूप से एक सेंटीमीटर के आकार की एक अत्यंत ठोस और गर्म गोली थी ! अचानक एक विस्फोट के कारण यह सम्पूर्ण तक विस्फोटित होती चली गई ! यह हमारा ब्रह्माण्ड उसी गोली में निहित था ! इस महाविस्फोट से अत्याधिक गर्मी और सघनता फैलती चली गई! कुछ वैज्ञानिक मानते है ,यह महाविस्फोट 15 अरब साल पहले हुआ था !इसी से सारे मूलभूत कणों(इलेक्ट्रान, प्रोटान, फोटान इत्यादि) ,उर्जा की उत्पत्ति हुई थी !यह मत भी प्रकट किया गया कि मात्र एक सेकेंड के दस लाखवे भाग में इतना बड़ा विस्फोट हुआ और अरबो किलोमीटर तक फैलता चला गया ! उसके बाद से इसका निरन्तर इसका विस्तार होता रहा और इसका विस्तार कहा तक हुआ यह अनुमान लगाना सम्भव नहीं है !आकाशगंगायो का जाल पूरे ब्रह्मांड में सभी जगहों पर फैला हुआ है !और ऐसा अनुमान है कि यह निरंतर बढ़ता ही रहेगा ! जैसे -2 इसका विस्तार होता जाएगा,आकाश गंगाए एक-दूसरे से अलग होती रहेंगी !
एक अन्य सिद्धांत (oscillating or pulsating universe theory) के अनुसार ,यह विश्व करोड़ो साल के अंतराल में फैलता और सिकुड़ता रहेगा ! इस सिधान्त को डॉ० एलेन संडेज ने प्रतिपादित किया है ! उनका कथन है कि आज से लगभग 120 करोड़ साल पहले एक भयंकर विस्फोट हुआ था और तब से विश्व विस्तृत होता जा रहा है! यह प्रसार लगभग 290 करोड़ साल तक चलता रहेगा ! उसके पश्चात इसका संकुचन प्रारम्भ हो जयेगा ,मतलब वह अपने अंदर से सिमट जाएगा ! इस प्रक्रिया को अत:विस्फोट कहते है !
उर्पयुक्त तथ्यों के बारे में निश्चित रूप से यह कह पाना कठिन है ,क्योंकि वैज्ञानिको के” ब्रह्मांड उत्पत्ति “प्रसंग में दिए गए सभी मत ,ज्यदातर अनुमानों और कल्पनाओ पर आधारित है ! अभी बहुत से लोगो को गलतफमी यह है कि हम ब्रह्मांड के बारे में सबकुछ जान गए है ! वास्तविकता यह है कि सैधांतिक शोध के आधार पर ब्रह्मांड में केवल 5 % ही दृश्य पदार्थ है ! 22 % पदार्थ अदृश्य है ,जिसे “डार्क मैटर ” कहा जाता है और 73% डार्क एनर्जी !
आकाश- गंगा (galaxy)
तारो के ऐसे विशाल समूह जो गुरूत्वाकर्षण बल के कारण एक -दूसरे से बंधे हुए हो ,उसे आकाशगंगा कहते है ।आकाशगंगा के ज्यदातर तारे आँखों से दिखाई नही पड़ते है ! आकाशगंगा में तारो(98% ) के आलावा गैस और धूल(2 %)भी होता है !हमारी आकाशगंगा ,जिसमे हमारा सूर्य भी एक सितारे के रूप में मौजूद है ! यह आकाशगंगा दुधिया पथ या “मिल्की वे “कहलाती है !खगोल-वैज्ञनिको का कथन है कि ब्रह्माण्ड में ऐसी अरबो आकाशगंगाए मौजूद है ।
आकाशगंगा तीन प्रकार के होते है -1)सर्पिल (spiral) ,2)दीर्घवृतिय (elliptical),3)और अनियमित (irregular) । अब तक की ज्ञात आकाशगंगायो में 80% सर्पिल ,17% दीर्घवृतिय और 3% अनियमित सरंचनावाले है ।
हमारी आकशगंगा का मध्य भाग उभरा हुआ है और एक नाभिक (nucleus)है । यहाँ पुराने सुर्ख तारे सघनता में है ! मध्यभाग के नाभिक से चार अत्यंत दीर्घ धाराए प्रसारित है ,जो सूर्य के कुंडलियो की तरह दिखाई देते है । इन धाराओ में नए नीले तारे है ,गैस और धूल है ,जिनसे नए सितारे बनते है ! यह वर्तुलाकार छेत्र ढाई-तीन सौ किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से फ़िरकी की तरह की घिरनी खाता रहता है ।