स्थिर ब्रह्माण्ड की अवधारणा (The concept of static universe)


सूर्य हमसे चौदह करोड़ अट्ठासी लाख किलोमीटर दूर हैं तथा सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग आठ मिनट अट्ठारह सेकंड लगते हैं ! इस तथ्य से हम आसानी से ब्रह्माण्ड की व्यापकता का अनुमान लगा सकते हैं ! हमार ब्रह्माण्ड में लगभग एक अरब आकाशगंगाये हैं ,तो यहाँ यह प्रश्न उठना यह स्वाभाविक हैं कि यह ब्रह्माण्ड स्थिर हैं या गतिशील हैं ?२०वी तथा २१वीं सदी में खगोल विज्ञान ने बहुत प्रगति की हैं और ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया हैं !
स्थिर ब्रह्माण्ड

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यदि आकाश में में न तो फैलाव हो रहा हो न तो कोई संकुचन हो रहा हो तो आकाश को स्थिर मान सकते हैं और यह पुरे ब्रह्माण्ड के लिए सत्य हैं ! न्यूटन ने आकाश में दिखने वाले तारोँ की स्थिति में कोई अंतर न पाकर स्थिर ब्रह्माण्ड की अवधारणा का जन्म दिया और तर्क दिया कि आकाशीय पिंडो को गुरुत्वाकर्षण के बिरुद्ध नेगिटिव मास काम करता हैं ! न्यूटन ने आकाश को अनन्त तारो और आकाशिय पिंडो से भरा अनन्त आकाश (ब्रह्माण्ड ) माना लेकिन तारों के अपने स्थान पर बने रहने का कारण खोज नही पाए !
पहले आइंस्टीन का भी मत था कि ब्रह्माण्ड स्थिर और सीमित हैं । सापेक्षता के अपने ही सिधान्त में स्थिर ब्रह्माण्ड से समन्धित कोई संकेत न मिलने के बावजूद स्थिर ब्रह्माण्ड की अवधारणा को बिलकुल सत्य माना । उन्होंने यह साबित करने के लिए की ब्रह्माण्ड स्थिर है ,अपने खुद के समीकरणों को संशोधित कर दिया । विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रेड होयल व भारतीय वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर ने ब्रह्माण्ड की अवधारणायो पर गहन अध्ययन कर अपने अलग मत (सिधान्त )दिए ।उनके अनुसार ब्रह्माण्ड के जन्म या अंत होने वाले सिधान्तो को सही नही माना । उनके अनुसार आकाश का किसी भी दिशा में ,किसी भी समय ,कहीं से भी देखने में सदा एक ही जैसा दिखता हैं । परन्तु उर्जा संरक्षण की समस्या का समाधान न मिलने की वजह से यह सिधान्त अत्याधिक मान्य नही हो सका ।
फैलता ब्रह्माण्ड

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स्थिर ब्रह्माण्ड के विरुद्ध पहली बार खुलकर अलक्जेंडर फ्रीडमान ने यह मत रखा की ब्रह्माण्ड गतिशील हैं ,और इसके पीछे यह तर्क दिया कि ब्रह्माण्ड का स्थिर रह पाना असम्भव हैं । जैसा की हम पहले बता चुके हैं कि आइंस्टीन का उर्जा समीकरण (E=mc2 ) ब्रह्माण्ड के स्थिर होने का कोई संकेत या तर्क नही देता । आइंस्टीन भी फ्रीडमान से कुछ समय तक सहमत नही रहे । एडविन पी हब्बल ने यह निष्कर्स निकाला(वर्ष 1925 ई .में ) कि हमारी आकाशगंगा(milky way) की तरह करोड़ो आकाशगंगाए मौजूद हैं । उन्होंने यह प्रमाणित किया कि सभी आकाशगंगाये एक दुसरे से दूर होती जा रही हैं ,उनके एक दूसरे से दूर जाने की गति उनके मध्य के अंतर में अनुपात हैं । जैसे-जैसे उनकी दूरी बढती जाती हैं ,उनके भागने की गति और तेज़ हो जाती हैं । इसे आकाशगंगा के प्रतिसरण (the law of recession of galxies) कहते हैं ।
आज हमारे पास अनेक तथ्य ऐसे हैं जो हमे बताते हैं की हमारा ब्रह्मांड वास्तव में फ़ैल रहा है यानि विस्तार कर रहा है । यह फैलाव लगभग 15 अरब साल पहले बिग-बैंग के समय से हो रहा हैं ।ब्रह्माण्ड का यह फैलाव उसे कहाँ तक ले जायेगा कोई भी नही जानता । हाँ,अब तक इस से समन्धित दो सिधान्त सामने आये हैं । पहला सिधान्त तो यह हो सकती हैं कि यह विश्व करोडो सालो तक फैलती और सिकुड़ती रहेगी और इसके बाद गुरुत्वाकर्षण इनके विस्तार की गति को रोक देगा ! इसके बाद यह सिकुड़ना शुरु हो जायेगा यानि अपने अन्दर ही सिमट जायेगा ,और शायद आकाश -गंगाए ब्लैक होल में परवर्तित हो जाएँगी । दूसरे सिधान्त का अनुसार (जो कि सर्वाधिक मान्य सिधान्त हैं । ) ब्रह्माण्ड निरंतर फैलता रहेगा ,और ऐसा ही रहेगा ।

by –pradeep kumar

 

 

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