सुब्रामन्यिम चन्द्रशेखर


20वीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिकों में से एक वैज्ञानिक सुब्रामन्यिम चन्द्रशेखर अपने जीवन काल में ही एक किंदवंति बन गए। कामेश्वर सी. वाली चन्द्रशेखर के जीवन के बारे में लिखता है कि “ विज्ञान की खोज में असाधारण समर्पण और विज्ञान के नियमों को अमली रूप देने और जीवन में निकटतम संभावित सीमा तक उसके मानों को आत्मसात करने में वह सब से अलग दिखाई देते हैं”। उसके बहुसर्जक योगदानों का विस्तार खगोल – भौतिक, भौतिक – विज्ञान और व्याहारिक गणित तक था। उसका जीवन उन्नति का सर्वोत्तम उदाहरण है जिसे कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है बशर्ते कि उसमें संकल्प – शक्ति, योग्यता और धैर्य हो। उसकी यात्रा आसान नहीं थी। उसे सब प्रकार की कठिनाईयों से झूझना पड़ा। वह एक ऐसी रचना थी जिसे भारत (जहां उसका जन्म हुआ), इंग्लैंड और यूएसए की तीन अत्यधिक भिन्न संस्कृतियों की जटिलताओं द्वारा आकार दिया गया।

वह मानवों की साझी परम्परा में विश्वास रखता था। उसने कहा था, “तथ्य यह है कि मानव मन एक ही तरीके से काम करता है। इस से हम पुन: आश्वस्त होते है कि जिन चीजों से हमें आनन्द मिलता है, वे विश्व के हर भाग में लोगों को आनन्द प्रदान करती है। हम सब का साझा हित है और इस तथ्य से इस बात को बल मिलता है कि हमारी एक साझी परम्परा है”। वह एक महान वैज्ञानिक, एक कुशल अध्यापक और दुर्जेय विद्वान था।ChandraNobel.png

सुब्रामन्यिन चन्द्रशेखर का जन्म लाहोर मे 19 अक्तूबर , 1910 को हुआ। उसके पिता सुब्रामन्यिन आयर सरकारी सेवा मे थे। सी.वी.रमन, विज्ञान में पहले भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेता चन्द्रशेखर के पिता के छोटे भाई थे। चन्द्रशेखर का बाल्य जीवन मद्रास (अब चेन्नई) में बीता। ग्यारह वर्ष की आयु में मद्रास प्रेसिडेंसी कालेज में उसने दाखिला लिया जहां पहले दो वर्ष उसने भौतिकी, कैमिस्टरी, अंगरेजी और संस्कृत का अध्ययन किया। चन्द्रशेखर ने 31, जुलाई 1930 को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड का प्रस्थान किया और इस प्रकार एक लबां और शानदार वैज्ञानिक कैरियर आंरभ किया जो 65 वर्षों तक विस्तृत था। पहले छ: वर्षों को छोड़, उसने शिकागो विश्वविद्यालय मे काम किया।

अपनी शानदार खोज ‘चन्द्रशेखर सीमा’ के लिए वह अत्यधिक प्रसिद्ध है। उसने दिखाया कि एक अत्याधिक द्रव्यमान है जिसे इलेकट्रानों और परमाणु नाभिकों द्वारा बनाये दाब द्वारा गुरुत्व के विरुद्ध सहारा दिया जा सकता है। इस सीमा का मान एक सौर द्रव्यमान से लगभग 1.44 गुणा है। 1930 में चन्द्रशेखर ने इसकी व्युपत्ति की जबकि वह एक विद्यार्थी ही था। तारकीय विकास की जानकारी प्राप्त करने में चन्द्रशेखर सीमा एक निर्णायक भूमिका निभाती है। यदि एक तारे का द्रव्यमान इस सीमा से बढ़ता है, तो तारा एक सफ़ेद बौना नहीं बनेगा। यह गुरुत्वाकर्षण की शक्तियों के अत्यधिक दाव के अन्तर्गत टूटता रहेगा। चन्द्रशेखर सीमा के प्रतिपादन के फलस्वरूप न्यूट्रोन तारों और काले गड्ढों का पता चला। यह नोट किया जाए कि तारे स्थिर होते हैं और वे समाप्त नहीं होते क्योंकि भतीरी दाब परमाणु नाभिकों और इलैक्ट्रानों के तापीय संचालन और नाभकीय प्रतिक्रियाओं द्वारा उत्पन्न विकिरण के दाब से भी गुरुत्व को सन्तुलित करते हैं। तथापि, प्रत्येक तारे के लिए एक ऐसा समय आयेगा जब नाभकीय प्रतिक्रियाएं बन्द हो जाएगी और इसका अर्थ यह होगा कि गुरुत्व-कर्षण का मुकाबला करने के लिए भीतरी दाब नहीं होंगे। द्रव्यमान के आधार पर एक तारे के तीन संभावित चरण होते हैं – सफ़ेद बोना, न्यूट्रान तारा और काले गड्ढे। चन्द्रशेखर को संयुक्त रूप से नाभकीय खगोल भौतिकी डब्ल्यू.ए.फाउलर के साथ 1983 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। चूंकि चन्द्रशेखर सीमा के कारण चन्द्रशेखर प्रसिद्ध है इसलिए उसके लिए कोई सीमा नहीं थी। जैसा पहले बताया गया है उसके काम के विस्तार में भौतिक – विज्ञान, खुगोल – भौतिक औप व्यावहारिक गणित शामिल हैं। उसके अपने शब्दों में “मेरे जीवन में सात काल आये और वे संक्षिप्त रूप से हैं
तारकीय ढांचा, सफ़ेद बौनों के सिद्धांत सहित (1929-39)
तारकीय गतिक, ब्राउमीन संचलनों के सिद्धांत सहित (1938-473)
विकिरणी अन्तरण का सिद्धांत, प्रदीप्ति और सौर प्रकाशित आकाश के ध्रुवण का सिद्धांत, गृहीय और तारकीय वातावरण के सिद्धांत और हाइड्रोजन के नकारात्मक आयन का परिमाण सिद्धांत
हाइड्रो-गतिक और हाइड्रो-चुंबकीय स्थिरता (1952-61)
साम्यावस्था की दीर्घवृत्तजीय आकृतियों का सन्तुलन और स्थायित्व। (1961-68)
सापेक्षता और आपेक्षिकीय खगोल-भौतिकी के सामान्य सिद्धांत (1962-71)
काले गड्ढों का गणितीय सिद्धांत (1974-73)”

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उसका अनुसाधान उत्पादन अपूर्व है और चन्द्रशेखर द्वारा प्रकाशित प्रत्येक मोनोग्राफ या पुस्तक गौरवग्रन्थ बन गए हैं। संबंधित क्षेत्रों का कोई भी गम्भीर विद्यार्थी चन्द्रशेखर के काम की उपेक्षा नहीं कर सकता। वह किसी एकल समस्या से नहीं बल्कि इस इच्छा से प्रेरित था कि समस्त क्षेत्र पर सापेक्ष महत्व या महत्वहीनता के बारे में वह कभी चिन्तित नहीं था। उसे इस बात की जरा भी चिन्ता नहीं थी कि उसका काम उसके लिए प्रसिद्धि और मान्यता लाने वाला है। उसने कहा : “ पहले तैयारी के वर्षों के बाद, मेरा वैज्ञानिक कार्य एक निश्चित पैटर्न पर चला है जो मुख्यतः संदर्शो की तलाश द्वारा प्रेरित है। व्यवहार में इस खोज में एक निश्चित क्षेत्र का मेरे द्वारा ( कुछ जांचों और कष्टों के बाद) चयन शामिल है जो संवर्धन के लिए परीक्षणीय दिखाई दिया और मेरी रूचि, मिजाज और योग्यताओं के अनुकूल था। और जब कुछ वर्षों के अध्ययन के बाद, मैं महसूस करता हूँ कि मै ने ज्ञान की पर्याप्त मात्रा संचित कर ली है और मैंने अपना दृष्टिकोण प्राप्त कर लिया है तो मेरी इच्छा है कि अपने दृष्टिकोण को मैं नए सिरे से सुसंगत तरीके से क्रम, रूप और ढांचे को प्रस्तुत करूँ ”।

एक बार जब वह एक विशेष क्षेत्र समाप्त कर लेता था तो एक नए क्षेत्र पर काम आरंभ करने के लिए तैयार हो जाता था। चन्द्रशेखर के वैज्ञानिक जीवन का सार था ‘एक क्षेत्र की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना, पूर्णरूप से समझ लेना और उसे आभ्यन्तर रूप देना’।

जो कुछ भी उसने किया, उसने प्रतीय लाजवाब सतर्कता के साथ ही नहीं बल्कि सुरुचिपूर्ण ढंग से किया। लिमनान स्पिटजर ने कहा, “चन्द्रशेखर के लैक्चर को सुनना और उससे सैद्धांतिक ढांचों के विकास का अध्ययन करना एक लाभप्रद और सौन्दर्यपरक अनुभव होता है।
आनन्द आदेश देता है और उन्हें पैराग्राफों में बांट देता है। क्या वे उन्हें छोटा या लंबा बनाते हैं ? उदाहरणार्थ, एक पैरा के लिए केवल एक ही वाक्य का प्रयोग करने, या एक अंतिम वाक्य का विचार जिसमें न तो कर्ता है और न ही कर्म। केवल चन्द शब्द ………….. इस प्रकार यह है …………. या कोई छोटा वाक्यांश जैसे वह। मैं ऐसी युक्तियों को जानबूझ कर अपनाता हूँ ”।

विज्ञान में पूरी तरह अन्ग्रस्त होते हुए भी, उसकी अन्य विषयों में भी दिलचस्पी थी आरंभ से ही उसकी साहित्य में रूचि थी। उसने कहा, “ वर्ष 1932 के आसपास कैम्ब्रिज में साहित्य में मेरी गम्भीर रुचि उत्पन्न हुई। उस समय मेरे लिए वास्तविक खोज रूसी लेखक थे। मैंने योजनाबद्ध तारीके से टर्गनेव के सब उपन्यास , दास्तोवस्की के क्राइम एंड पनिशमेंट, ब्रर्दस कारमाजोव, और पोसेस्ड उपन्यास कांस्टांस गार्नेट अनुवाद में पढ़े। शैकव की सब कहानियों और नाटकों को पढ़ा। टालस्टाय के सब तो नहीं लेकिन अन्ना केरनीना जरूर पढ़ा। अंग्रेजी लेखकों में से मैंने विरजीना वुल्फ, टी एस ईलियट, थामस हार्डी, जॉन गाल्सवर्दी और बर्नाडशा को पढ़ना आरंभ किया। हेनरिक इबसेन भी मेरे प्रिय लेखकों में से एक था।

दूसरों में परिश्रम के लिए उत्साह उत्पन्न करने की चन्द्रशेखर में विलक्षण योग्यता थी। उसके मार्गदर्शन मे 50 से ज्यादा विद्यार्थीयों ने PHD कार्य किया। अपने विद्यार्थीयों के साथ उसके संबंध हमें पुराने जमाने की गुरू शिष्य परंपरा की याद दिलाते है। विद्यार्थीयों से वह आदर प्राप्त करता था लेकिन वह उन्हें उत्साहित भी करता था कि वे अपने दृष्टिकोण निर्भिक हो कर रखें। उसने कहा : “मेरे विद्यार्थी, ऐसे विद्यार्थी जिनके साथ मैंने निकट से काम किया है, वे एक प्रकार से श्रद्धालू है जो पुराने जमाने की याद दिलाते है जिन्हें हम पुस्तकों में पढ़ते हैं। इसके साथ ही जो मैं कहता हूँ उससे वे बिल्कुल भयभीत नहीं होते। उनकी प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी या नकारात्मक, वे चर्चा करते हैं और तर्क वितर्क भी करते हैं। जो आप कहते हैं यदि कोई व्यक्ति उससे पूरी तरह सहमत होता है तो विचार – विमार्श का कोई बिन्दु नहीं होती ”।

अपने समग्र व्यावसयिक जीवन में जवान लोगों के साथ उसने अन्योन्य क्रिया बनाए रखी। एक बार उसने कहा : “ मैं आसानी से कल्पना कर सकता हूँ कि यदि मैंने फार्मी या वॉन न्यूमान के साथ काम नहीं किया तो कुछ भी नहीं खोया, लेकिन अपने विद्यार्थीयों के बारे में मैं वैसी बात नहीं कर सकता ”।
वह 1952 से 1971 तक खगोल-भौतिकी पत्रिका का प्रबन्ध सम्पादक रहा। शिकागो विश्वविद्यालय की एक निजी पत्रिका को उसने अमेरिकन एस्ट्रोनामीकल सोसाइटी की एक राष्ट्रीय पत्रिका के रूप में परिवर्तित कर दिया। पहले बारह वर्षों तक पत्रिका की प्रबन्ध – व्यवस्था चन्द्रशेखर और एक अंश कालिक सचिव के हाथ में थी। “हम मिलजुल कर सारे नेमी काम करते थे। हमने वैज्ञानिक पत्राचार पर ध्यान दिया। हम बजट, विज्ञापन और पृष्ठ प्रभार तैयार करते थे। हम री – प्रिंट आर्डर देते थे और बिल भेजते थे ”। जब चन्द्रशेखर सम्पादक बना तो पत्रिका वर्ष मे छः बार निकलती थी और कुल पृष्ठ संख्या 950 थी लेकिन चन्द्रशेखर के सम्पादकत्व की समाप्ति के समय पत्रिका वर्ष में चौबीस बार प्रकाशित होती थी और कुल पृष्ठ संख्या 12,000 थी। उसके नेतृत्व में पत्रिका शिकागो विश्वविद्यालय से वित्तीय रूप से स्वतन्त्र हो गई। उसने पत्रिका के लिए अपने पिछे 500,000 यू एस डालर की आरक्षित निधि छोडी।
चन्द्रशेखर मुख्यतः विदेश में और वहीं काम किया। 1953 में वह अमरीकी नागरिक बना गया। तथापि भारत की बेहतरी की उसे गहरी चिन्ता थी। भारत में बहुत से विज्ञान संस्थानों और जवान वैज्ञानिकों के साथ उसका गहरा संबंध था। अपने बचपन में उसे रामानुजम के विज्ञान के प्रति सम्पूर्ण समपर्ण के उदाहरण से प्रेरणा मिली थी। रामानुजम में उसकी दिलचस्पी जीवन भर बनी रही। 1940 के उत्तर्राध में मद्रास में रामानुजम इंस्टीच्यूट ऑफ मैथिमैटिक्स स्थापित करने में सहायक की भूमिका अदा की और जब इंस्टीच्यूट को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा तो उसने इस मामले को नेहरूजी के सामने रखा। रामानुजम की विधवा जो गरीबी की हालत में रह रही थी, उसके लिए पेंशन राशि में वृद्धि कराने की व्यवस्था की। रिचर्ड आस्के द्वारा रामानुजम की अर्धप्रतिमाएं ढलवाने के लिए भी वह उत्तरदायी था।
विज्ञान की खोज में लगे रहने में चन्द्रशेखर के लिए क्या प्रेरणा थी ? उसके एक विद्यार्थी यूवूज़ नूटकू ने कहा: “ हर समय सीखते हुए चन्द्र संस्थापन के बारे में तनिक भी चिन्ता नहीं करता था। जो कुछ उसने किया वह इस लिए किया क्योंकि वह उपजाऊ तरीके से जिज्ञासु था। उसने केवल एक कारण से ही यह किया – इससे उसे शांति और आन्तरिक शान्ति मिलती थी ”।

जो विज्ञान की खोज में लगे हैं या ऐसा करने की योजना बना रहे हैं उनके लिए हम चन्द्रशेखर को उद्धृत करते हुए इसे समाप्त करना चाहेगें। “ विज्ञान की खोज की तुलना कई बार पर्वतों ऊँचे लेकिन ज्यादा ऊँचें नहीं, के आरोहण के साथ की गई है। लेकिन हममें से कौन आशा, या कल्पना ही, कर सकता है कि असीम तक फैली एवरेस्ट पर चढ़ाई करे और उसके शीर्ष पर पहुंचे जब कि आकाश नीला हो और हवा रूकी हुई हो और हवा की स्तब्धता में बर्फ के सफे़द चमकीलेपन में समस्त हिमालय घाटी का सर्वेक्षण करे। हम में से कोई अपने इर्द गिर्द विश्व और प्रकृति के तुलनात्मक दृष्टि के लिए आशा नहीं कर सकता। लेकिन नीचे घाटी में खड़े होना और कंचनजंगा के ऊपर सूर्योदय होने की प्रतीक्षा करने में कुछ भी बुराई या हीनता नहीं है”।
चन्द्रशेखर का निधन 21 अगस्त, 1995 को हुआ।

सौजन्य से -ड्रीम 2047,लेखक -सुबोध महंती

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