नासा लांच करेगा उड़न तश्तरी


by-pradeep kumar
140612144203_ufo_624x351_alamy उड़न तश्तरी
अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा एक ऐसा अंतरिक्ष यान लांच करने जा रही है जो देखने में एकदम उड़न तश्तरी की तरह दिखता है(चित्र 1 ).

क़रीब आधी से अधिक शताब्दी से ये विशिष्ट आकार लोगों की सबसे लोकप्रिय कल्पनाओं में शामिल रहा है! नासा उड़न तश्तरी के आकार के लो-डेंसिटी सुपरसोनिक डेसिलेरेटर (एलडीएसडी) के परीक्षण की तैयारी कर रहा है! अंतरिक्ष एजेंसी को उम्मीद है कि एक दिन ये यान मंगल ग्रह पर लैंड करेगा! उड़न तश्तरी के आकार के यानों को ‘फॉरबिडेन प्लैनेट’ और ‘द डे दि अर्थ स्टुड स्टिल’ जैसी साइंस फिक्शन फ़िल्मों में दिखाया जा चुका हैं ! अब उड़न तश्तरी लोगों के दिलोदिमाग पर छाई हुई है और अब ये एक ‘आइकन’ बन गई है!

सबकी पसंद
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उड़न तश्तरी
जबसे यूएफ़ओ (उड़ती हुई अनजान चीज) विशेषज्ञों ने इस तरह की आकृति की तस्दीक की है, तबसे डिजाइनरों ने इस आकृति को पूरी तरह अपना लिया है! ब्राजील के समकालीन कला संग्रहालय से लेकर फ़ोन और केतली जैसे घरेलू उपकरणों को इस आकृति में ढाला गया !

नॉर्थम्प्टन विश्वविद्यालय में साइंस फैंटेसी और पापुलर कल्चर के विशेषज्ञ माइकल स्टार कहते हैं, “ये एक यूनीवर्सल रूपक बन गया है!”

नासा यूएफओ
वैसे तो डिस्क के आकार की चीजें आसमान में हमेशा से दिखती रही हैं, लेकिन उड़न तश्तरी को आम लोगों के बीच उस समय मान्यता मिली जब 24 जून, 1947 को पायलट केनेथ ऑर्नोल्ड ने बताया कि उन्होंने वाशिंगटन प्रांत में माउंट रैनियर के पास नौ चमकीले यूएफ़ओ देखे!

ऑर्नोल्ड ने बताया कि ये यूएफ़ओ तश्तरी के आकार के थे. इस ख़बर को अख़बारों में काफ़ी जगह मिली और जल्दी ही समाचार पत्रों ने “उड़न तश्तरी” शब्द को गढ़ लिया! इस घटना के बाद  ही रॉसवैल और न्यू मैक्सिको सहित कई स्थानों पर इस तरह के यान दिखाई देने की ख़बरें आईं !

माइकल स्टार बताते हैं कि इस तरह की उड़न तश्तरियां पश्चिमी लोगों की कल्पना में आने की एक वजह ये थी कि उन्हें अपने कम्युनिस्ट शत्रुओं से हमले का ख़तरा था!

व्यावहारिकता
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उड़न तश्तरी
स्विटज़रलैंड के मनोचिकित्सक कार्ल जुंग उड़न तश्तरियों के आकार को बौद्ध और हिंदू धर्म के धार्मिक चिन्ह ‘मंडल’ से प्रेरित बताते हैं.

स्टार बताते हैं कि पचास के दशक में साइंस फिक्शन में इस आकार को अपनाने की एक प्रमुख वजह ये रही थी इसका फ़िल्मांकन करना बेहद आसान था! स्टार बताते हैं, “आपको बस एक प्लेट और एक डोरी की ज़रूरत है. व्यावहारिक नज़रिए से ये कमाल का है.”

शेफ़ील्ड हैलम यूनिवर्सिटी के डेविड क्लार्क ने अपने जीवन के तीन दशक यूएफ़ओ के अध्ययन में बिताए हैं. क्लार्क बताते हैं, “या तो एलियंस ने अपने विमान के लिए एक ऐसा डिज़ाइन तैयार किया जो हमारी दुनिया की फ़िल्मों के लिहाज़ से फ़िट था या फिर कुछ और ही चल रहा था !”

नासा यूएफओ
लेकिन डिस्क के आकार की उड़न तश्तरियों को दुनिया भर की सरकारों और सेना ने कोरी कल्पना नहीं माना!उदाहरण के लिए जर्मनी के इंजीनियर जॉर्ज क्लेन ने सीआईए को बताया कि उन्होंने एक नाज़ी उड़न तश्तरी के लिए काम किया ! सैद्धान्तिक रूप से ये आकार एयरोडायनमिक्स के लिहाज़ से सटीक है. अंतरिक्ष वैज्ञानिक मैगी एडरिन पोकोक ने बताया, “अगर ये हॉरिज़ॉटली हवा के साथ चल रहा है तो बहुत अधिक वायु प्रतिरोध नहीं होना चाहिए.” समस्या सिर्फ संचालन प्रणाली को लेकर है! ऐसे में नासा के इंजीनियरों को उम्मीद है कि एलडीएसडी का परीक्षण सफल होगा!

साभार :बीबीसी न्यूज़ मैगज़ीन

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बर्फ से आग जलाना !


क्या आप जानते है ,कि बर्फ की मदद से आग सुलगाया जा सकता है ? क्या आप जानते है ?,कि बर्फ की मदद से उत्तल लेंस (convex lens)बनाया जा सकता है और इसलिए आप बर्फ से भी आग सुलगा सकते है । लेकिन एक शर्त है ,शर्त यही है कि वह पर्याप्त पारदर्शी(जिसके आर-पार देखा जा सकता हो ) हो । और इसके लिए हम सौर-किरणों की मदद लेते है । आप सोंच रहे होंगे कि ऐसे तो बर्फ को धूप में लाने से पिघल जाएगी ,लेकिन बर्फ धूप में पिघलेगी नही ,क्योंकि किरणों को अपवर्तित करने से वह गर्म नही होती । जैसा की हम जानते है कि पानी और बर्फ के परावर्तन(reflection) में ज्यादा अंतर नही है ।
बर्फ का लेंस अच्छा काम आया था जूल वेर्न द्वारा लिखित “कैप्टेन हेटारस की यात्रा ” में । माचिस खो चुका था और भयानक ठण्ड में कही से आग जलाने की गुंजाइश नही थी । सोंच में पड़े यात्रियों को इस स्थिति से मुक्ति दिलायी डॉ० क्लाबोनी ने :-
-यह दुर्भाग्य की बात है ,हेटरास ने कहा
-हाँ ,-डॉक्टर ने उत्तर दिया ।
-हमारे पास दूरबीन भी नही है कि उसका लेंस निकालकर आग जलाये ।
-जानता हूँ ,-डॉक्टर ने कहा ,-और बहुत अफ़सोस की बात है । यहाँ सूरज कितना तेज़ चमक रहा है सूखी घास बहुत जल्द सुलग जाता ।
फिर डॉक्टर ने सोंचते हुए कहा –मेरे मन में एक विचार आया है ! हम लेंस बना सकते है !
हेटरास ने पूछा -कैसे ?
-बर्फ के टुकड़े से ,डॉक्टर ने कहा
-क्या आप सचमुच सोंच रहे हैं की …. हेटरास ने कहा
डॉक्टर-और नही तो क्या ! आखिर सूर्य-किरणों को एक बिंदु पर जमा ही तो करना है ,और इसकेलिए बर्फ अच्छे-से –अच्छा लेंस की बराबरी कर सकता है । लेकिन मै मीठे पानी से जमे बर्फ को अधिक पसंद करूंगा ,क्योंकि यह अधिक कड़ा और पारदर्शी होता है । एक जगह की ओर इशारा करते हुए बोले –यदि मै गलत नही हु ,तो मुझे इसी की जरुरत है । बर्फ के उस टीले का रंग देखिये “वह मीठे पानी से जमा है ।
दोनों मिलकर उस टीले की ओर चल पड़े । बर्फ सचमुच मीठे पानी का था ।
डॉक्टर ने करीब एक फीट व्यास वाले बर्फ के टुकड़े को काटने के लिये कहा । इसके बाद उसने उसे समतल सा किया फिर चाकू से काट-छाट की ,लेंस के आकार में तराशा और हाथ से रगड़ -2 कर उसे चिकना कर लिया । लेंस तैयार था और अच्छे से अच्छे लेंस से टक्कर ले सकता था । सूरज बहुत तेज़ी से चमक रहा था । डॉक्टर ने लेंस को किरणों के रास्ते (पथ ) में रखा और सूखी घास पर उन्हें केन्द्रित किया । घास कुछ ही समय में जल उठी ।
जूल वेर्न का यह किस्सा काल्पनिक है ,लेकिन यह इतना भी काल्पनिक नही है :बर्फ के लेंस से आग जलाने का प्रयोग पहली बार इंगलैंड में किया गया था । 1763 ई. में वहाँ बर्फ के काफी बड़े लेंस से एक पेड़ में आग लगायी गयी थी । तब से यह प्रयोग कई बार सफलतापूर्वक दुहराया जा चुका है । यह बात दूसरी है कि बर्फ का पारदर्शी लेंस चाकू और खाली हाथ(भयानक ठण्ड में) जैसे औजारो से बनाना कठिन है । पर बर्फ का लेंस बनाने के लिए आसान तरीका भी है :चित्र के अनुरूप कटोरी में पानी डाल कर फ्रीज़ में जमा लीजिये और फिर बर्तन को हल्का सा गर्म करके तैयार लेंस निकाल लीजिये ।बर्फ बनाने के लिए कटोरी
सूर्य-किरणों से सहायता
ऐसे लेंस का प्रयोग करते वक्त यह न भूले कि खिड़की के दर्पण से आने वाली धूप में आप कुछ नही जला पायेंगे । दर्पण सूर्य-किरणों की ऊर्जा को काफी बड़ी मात्रा में सोख लेता है और बची-खुची ऊर्जा इतनी ज्यादा नही होती कि किसी चीज़ को जलाने लायक गर्मी दे सके । बेहतर है खुले स्थान पर किसी ऐसे जगह पर प्रयोग करे ,जहाँ का वातावरण का तापमान जीरो से नीचें हो ।
एक और प्रयोग करे ,जो सर्दियों में आसानी से किया जा सकता है । धूप में घर के बाहर एक बर्फ का बड़ा टुकड़ा रख दे । बाहर पड़ी बर्फ पर एक नाप के दो कपड़े के टुकड़े –एक काला और एक सफ़ेद –रख दे । एक घंटे बाद आप देखेंगे की काला कपड़ा बर्फ में कुछ नीचे धंस गया है ,पर सफ़ेद उसी ऊँचाई पर है । कारण ज्यादा कठिन नही है :काले कपड़े के नीचे बर्फ जल्द पिघलता है ,क्योंकि काले धागे सूर्य-किरणों के बहुत बड़े भाग को सोख लेता है । सफ़ेद कपड़ा उल्टा उसे (प्रकाश को ) छितरा देता है और इसलिये काले कपड़े की तुलना में बहुत कम गर्म होता है । यह प्रयोग सबसे पहले संयुक्तराष्ट्र के वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रेंकलिन ने किया था । उनका नाम तड़ित-चालक के लिए प्रसिद्ध है । वे अपने प्रयोग का वर्णन इस प्रकार करते है :”एक बार मै दर्जी की दूकान से कपड़ो के कई टुकड़े ले आया । हर टुकड़े का रंग अलग-2 था –काला,नीला,हल्का नीला,हरा,गुलाबी ,सफेद । और भी कई दूसरे रंग थे । एक दिन जब अच्छी धूप उगी हुई थी,मैंने इन टुकड़ो को बाहर बर्फ बिछा दिया । काला कपड़ा कुछ ही घंटो बाद इतना गर्म हो गया कि बिलकुल ही बर्फ में धँस गया । सूर्य की किरण अब उस उस तक नही पहुँच रही थी । नीला कपड़ा भी उतना ही धँसा हुआ था , जितना काला । हल्का नीला काफी कम धँसा हुआ था अन्य रंग के कपड़े उतना ही कम धंसे थे ! सफ़ेद कपड़ा तो बिलकुल नही धँसा नही था । “
यह सिधान्त बेकार होता ,यदि उससे कोई निष्कर्स नही निकाला जा सकता –आगे वे कहते है ।-क्या हमे इस प्रयोग से यह नही पता चलता की गर्म जलवायु वाले देश में ,जहाँ सूरज काफी तेज चमकता है ,सफ़ेद की तुलना में काला कपड़ा अधिक गर्मी देता है ,अत: कम फायदेमंद है । यदि हमारे शरीर की उन गतियो पर ध्यान दिया जाये ,जो शरीर को खुद-ब-खुद गर्मी देते है ,तो काला कपड़ा और भी बेकार है वह शरीर को अतिरिक्त गर्मी देता है । क्या वहाँ स्त्री-पुरुषो की टोपिया सफ़ेद नही होनी चाहिये,जो लू लगाने वाली गर्मी से बचाव करती है ? क्या ध्यान से प्रयोग करने वाला व्यक्ति अनेक दूसरी छोटी-बड़ी बातो से दूसरे प्रकार के लाभ नही प्राप्त कर सकता ?
(नोट-इस लेख के कुछ अंश (numerator) ya.perelman के पुस्तक physics for entertainment से लिया गया है !)

कहानी ब्रह्मांड की !


प्रदीपदुनिया कब बनी ?कैसे बनी ?-यह एक लम्बी कहानी है ! यह सब -कुछ जानने के लिए सबसे पहले हमे यह जानना होगा कि ब्रह्माण्ड क्या है ?यह कब बना तथा कैसे बना है ?यह पहले किस स्थिति में रहा होगा ?अब यह कहा और क्यों जा रहा है ?और हमारे ब्रह्माण्ड का भविष्य क्या होगा ?
ब्रह्माण्ड के समन्ध में उपरलिखित प्रश्नों का उत् र पाना सदा से ही कठिन रहा है ,जिस प्रकार कोई यह नहीं कह सकता कि पहले मुर्गी आयी या अंडा ?उसी प्रकार कोई यह नही बता सकता की ब्रह्माण्ड का जन्मदाता कौन है ?प्रस्तुत लेख में इन्ही प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिस की गयी है !
वास्तविकता में ब्रह्मांड के बारे में ऐसे अनेक तथ्य है ,जिनके बारे में विज्ञान को भी बहुत कम जानकारी है !ब्रह्माण्ड के बारे में बहुत कुछ अनुमानों के आधार पर वैज्ञानिको ने अपने मत प्रस्तुत किये है ! रात के समय आकाश की ओर देखे तो दूर-२तक तारे ही तारे दिखाई देते है !दरअसल यही आसमान ब्रह्माण्ड का एक भाग कहा जा सकता है !पूरा ब्रह्माण्ड हमे दिखाई दे ही नही सकता ,इतना असीम की हमारी नज़र उस सम्पूर्ण तक पहुँच ही नही सकती i आकाश में जो तारो के समूह दिखाई देती है ,वे आकाशगंगाए है i
ब्रह्माण्ड कितना विशाल है ,इसकी हम कल्पना भी नही कर सकते ! अरबो-खरबों किलोमीटर चौड़ा मालूम होता है ! ब्रह्मांड की दूरियां इतनी बड़ी होती है कि उन्हें नापने के लिए एक विशेस पैमाना निर्धारित करना पड़ा -लाइट ईयर (light year) ! दरअसल प्रकाश एक सेकेंड में लगभग तीन लाख किलोमीटर की दूरी तय करती है !इसलिए एक लाइट ईयर 94खरब ,60 अरब ,52 करोड़ ,84 लाख ,5हजार किलोमीटर की दूरी तय करेगी !
अब आते है ,ब्रह्माण्ड की सिधान्तो पर -1) सर्वप्रथम 140 ई. में यूनानी खगोलशास्त्री टालेमी ने पूरे विश्व का अध्ययन किया ! और उसने भूकेंद्री सिद्धांत (geocentric theory) दिया ! इस सिद्धांत के अनुसार ,पृथ्वी विश्व के केंद्र में स्थित है और सूरज और बाकि ग्रह इसकी परिक्रमा करते है !
2)सन १५४३ में टालेमी के भूकेंद्री सिद्धांत को गलत सिद्ध किया और सूर्य केंद्री सिद्धांत (heliocentric theory) का प्रतिपादन किया ! इस सिद्धांत के अनुसार ,विश्व के केंद्र में सूरज है न की पृथ्वी और पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है !
3)जोहान्स केप्लर ने सर्वप्रथम ग्रहों के गति के नियम दिए ! जिनके अनुसार ग्रहों के चारो चक्कर लगाने -वाले ग्रहों का पथ अंडाकार (elliptical) है !
महाविस्फोट (big-bang) से हुआ ब्रह्माण्ड का जन्म !
ब्रह्माण्ड की उत्पति कैसे हुई ?इस प्रश्न के उत् र स्वरुप कुछ वैज्ञनिको की अनोखी मान्यता है (यह ब्रह्माण्ड के उत्त्पति का सबसे ज्यादा माना जाने वाला सिद्धांत है ) इस सिद्धांत का प्रतिपादन जार्ज लेमितरे (georges lemitre) नामक एक खगोलशास्त्री ने किया था !इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड एक अकास्मित घटना के कारण अस्तित्व में आया ! सिधान्त के अनुसार ,प्रारम्भिक रूप से एक सेंटीमीटर के आकार की एक अत्यंत ठोस और गर्म गोली थी ! अचानक एक विस्फोट के कारण यह सम्पूर्ण तक विस्फोटित होती चली गई ! यह हमारा ब्रह्माण्ड उसी गोली में निहित था ! इस महाविस्फोट से अत्याधिक गर्मी और सघनता फैलती चली गई! कुछ वैज्ञानिक मानते है ,यह महाविस्फोट 15 अरब साल पहले हुआ था !इसी से सारे मूलभूत कणों(इलेक्ट्रान, प्रोटान, फोटान इत्यादि) ,उर्जा की उत्पत्ति हुई थी !यह मत भी प्रकट किया गया कि मात्र एक सेकेंड के दस लाखवे भाग में इतना बड़ा विस्फोट हुआ और अरबो किलोमीटर तक फैलता चला गया ! उसके बाद से इसका निरन्तर इसका विस्तार होता रहा और इसका विस्तार कहा तक हुआ यह अनुमान लगाना सम्भव नहीं है !आकाशगंगायो का जाल पूरे ब्रह्मांड में सभी जगहों पर फैला हुआ है !और ऐसा अनुमान है कि यह निरंतर बढ़ता ही रहेगा ! जैसे -2 इसका विस्तार होता जाएगा,आकाश गंगाए एक-दूसरे से अलग होती रहेंगी !
एक अन्य सिद्धांत (oscillating or pulsating universe theory) के अनुसार ,यह विश्व करोड़ो साल के अंतराल में फैलता और सिकुड़ता रहेगा ! इस सिधान्त को डॉ० एलेन संडेज ने प्रतिपादित किया है ! उनका कथन है कि आज से लगभग 120 करोड़ साल पहले एक भयंकर विस्फोट हुआ था और तब से विश्व विस्तृत होता जा रहा है! यह प्रसार लगभग 290 करोड़ साल तक चलता रहेगा ! उसके पश्चात इसका संकुचन प्रारम्भ हो जयेगा ,मतलब वह अपने अंदर से सिमट जाएगा ! इस प्रक्रिया को अत:विस्फोट कहते है !
उर्पयुक्त तथ्यों के बारे में निश्चित रूप से यह कह पाना कठिन है ,क्योंकि वैज्ञानिको के” ब्रह्मांड उत्पत्ति “प्रसंग में दिए गए सभी मत ,ज्यदातर अनुमानों और कल्पनाओ पर आधारित है ! अभी बहुत से लोगो को गलतफमी यह है कि हम ब्रह्मांड के बारे में सबकुछ जान गए है ! वास्तविकता यह है कि सैधांतिक शोध के आधार पर ब्रह्मांड में केवल 5 % ही दृश्य पदार्थ है ! 22 % पदार्थ अदृश्य है ,जिसे “डार्क मैटर ” कहा जाता है और 73% डार्क एनर्जी !
आकाश- गंगा (galaxy)
तारो के ऐसे विशाल समूह जो गुरूत्वाकर्षण बल के कारण एक -दूसरे से बंधे हुए हो ,उसे आकाशगंगा कहते है ।आकाशगंगा के ज्यदातर तारे आँखों से दिखाई नही पड़ते है ! आकाशगंगा में तारो(98% ) के आलावा गैस और धूल(2 %)भी होता है !हमारी आकाशगंगा ,जिसमे हमारा सूर्य भी एक सितारे के रूप में मौजूद है ! यह आकाशगंगा दुधिया पथ या “मिल्की वे “कहलाती है !खगोल-वैज्ञनिको का कथन है कि ब्रह्माण्ड में ऐसी अरबो आकाशगंगाए मौजूद है ।
आकाशगंगा तीन प्रकार के होते है -1)सर्पिल (spiral) ,2)दीर्घवृतिय (elliptical),3)और अनियमित (irregular) । अब तक की ज्ञात आकाशगंगायो में 80% सर्पिल ,17% दीर्घवृतिय और 3% अनियमित सरंचनावाले है ।
हमारी आकशगंगा का मध्य भाग उभरा हुआ है और एक नाभिक (nucleus)है । यहाँ पुराने सुर्ख तारे सघनता में है ! मध्यभाग के नाभिक से चार अत्यंत दीर्घ धाराए प्रसारित है ,जो सूर्य के कुंडलियो की तरह दिखाई देते है । इन धाराओ में नए नीले तारे है ,गैस और धूल है ,जिनसे नए सितारे बनते है ! यह वर्तुलाकार छेत्र ढाई-तीन सौ किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से फ़िरकी की तरह की घिरनी खाता रहता है ।